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	<title>सन्देश Archives - लोकरंग</title>
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	<description>लोक संस्कृतियों के निरूपण का विनम्र प्रयास</description>
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	<title>सन्देश Archives - लोकरंग</title>
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		<title>लोकरंग 2016  पर  जिलाधिकारी , कुशीनगर  का शुभकामना सन्देश</title>
		<link>https://lokrang.in/greeting-message-from-district-magistrate-kushinagar-on-lokrang-2016/569/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:56:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोकरंग सांस्कृतिक समिति, जोगिया फाजिलनगर (कुशीनगर ) द्वारा जनकवि रमाशंकर &#8216;विद्रोही&#8217; को समर्पित &#8216;लोकरंग 2016&#8217; सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन दिनांक 07-08 मई 2016 को जोगिया जनूबी पट्टी में किया गया था &#124; &#160;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लोकरंग सांस्कृतिक समिति, जोगिया फाजिलनगर (कुशीनगर ) द्वारा जनकवि रमाशंकर &#8216;विद्रोही&#8217; को समर्पित &#8216;लोकरंग 2016&#8217; सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन दिनांक 07-08 मई 2016 को जोगिया जनूबी पट्टी में किया गया था |</p>
<p><a href="https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-570" src="https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01.jpg" alt="" width="1279" height="1980" srcset="https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01.jpg 1279w, https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01-194x300.jpg 194w, https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01-661x1024.jpg 661w, https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01-768x1189.jpg 768w, https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01-992x1536.jpg 992w, https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01-300x464.jpg 300w, https://lokrang.in/wp-content/uploads/2023/01/Lokrang-2016-shubkamna-1_01-850x1316.jpg 850w" sizes="(max-width: 1279px) 100vw, 1279px" /></a></p>
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		<title>लोकरंग 2015  का आयोजन</title>
		<link>https://lokrang.in/lokrang-2015-organized/567/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:55:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोकरंग के माध्यम से लोक को संवारने का प्रयास कुशीनगर जिले के जोगिया जनूबी पट्टी गांव में हर वर्ष आयोजित होने वाला लोकरंग कार्यक्रम का दो दिवसीय समारोह 12 और 13 अप्रैल को आयोजित हुआ। यह आयोजन का आठवा वर्ष था। इस बार का आयोजन असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लोकरंग के माध्यम से लोक को संवारने का प्रयास</p>
<p>कुशीनगर जिले के जोगिया जनूबी पट्टी गांव में हर वर्ष आयोजित होने वाला लोकरंग कार्यक्रम का दो दिवसीय समारोह 12 और 13 अप्रैल को आयोजित हुआ। यह आयोजन का आठवा वर्ष था। इस बार का आयोजन असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाले कुशीनगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों हनुमान प्रसाद कुशवाहा, ब्रह्मदेव शर्मा, मुशी तप्तीलाल और मोती भगत को समर्पित किया गया था। इन चारों सेनानियों की खोज, सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने 8 मई, 1921 के स्वदेश अखबार में प्रकाशित समाचार के आधार पर किया था । इस वर्ष के आयोजन की खास बात यह थी कि भोजपुरी क्षेत्र की लोक कलाओं के साथ-साथ झारखंड, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल के लोक कलाओं से भी लोगों को रूबरू होने का मौका मिला।<br />
‘लोकरंग’ का यह आठवां साल, लोककला अभिव्यक्तियों का एक दुर्लभ समागम बन चुका है। जोगिया जुनूबी पट्टी के निवासियों और आयोजकों का एक ऐसा अभियान जिसका महत्व हर साल बढ़ता जा रहा है. केन्द्रीय अकादमियों और संस्कृति मंत्रालयों के गलियारे महज फाइलों की गंध से सजे हैं जबकि लोकरंग के विविध रंगों से सजे इस दो दिन के सांस्कृतिक मेले में जीवन की धड़कनें सुनी जा सकती हैं । बिना किसी अनुदान या ग्रांट के महज जिद और जन सहयोग के बल पर खड़ा लोकरंग एक जरूरी आयोजन लगता है।<br />
यहां केवल लोकनृत्य, लोक गायकी या लोक वाद्यों का आत्मसात ही नहीं होता अपितु ‘संभावना कला मंच’, गाजीपुर की टीम, पूरे गांव को कलाग्राम में तब्दील कर देती है । इस वर्ष किसान त्रासदी पर बनाई गई आकृति ने, मौसम की मार से तबाह होते गंवई समाज को झकझोर कर रख दिया । इस टीम ने पूरे गांव की दीवारों पर अनूठी चित्रकारी की थी और मंच को आकर्षक ढंग से सजाया था ।</p>
<p>वर्ष 2008 में इस गांव के निवासी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने गांव के युवकों के सहयोग से इस समारोह को शुरू किया था। इसका उद्देश्य संस्कृति के नाम पर हो रहे फूहड़पन के खिलाफ सकारात्मक पहल करते हुए जन संस्कृति का संवर्धन करना था। इस समारोह के जरिए पूर्वांचल की जमीन पर यहां के लोक कलाओं को मंच देने के साथ-साथ दूसरे अंचलों के लोक कलाओं से एक दूसरे को जोड़ने का भी उद्देश्य था।<br />
पहले वर्ष यह कार्यक्रम लोकरंग सांस्कृतिक समिति के सदस्य मंजूर अली के अहाते में आयोजित हुआ। तीन वर्ष बाद यह अहाता छोटा पड़ गया तो सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने गांव की सीमा पर अपने खेत को लोकरंग परिसर बना दिया। यहां पर एक बड़ा मुक्ताकाशी मंच बना और यहीं पर लोक कलाकारों को ठहरने के लिए कमरे भी बने। वर्ष भर इस परिसर में खेती होती है तो मुक्ताकाशी मंच पर गांव के युवक नाटकों का रिहर्सल व मंचन करते हैं। वर्ष 2011 से इसी मंच पर यह आयोजन हो रहा है।<br />
यह आयोजन गैर सरकारी प्रयास से आयोजित होने वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा लोक उत्सव बन गया है। इस आयोजन ने जोगिया गांव की आज से एक दशक पहले बनी नकारात्मक छवि को भी बदल दिया है। इस गांव में मानसिक रूप से बीमार एक महिला को कुछ स्वार्थी तत्वों ने देवी घोषित कर दिया था और उसके हाथ से दिए गए पानी को चमत्कारिक बताते हुए तमाम लाइलाज रोगों के लिए साध्य बता कर खूब प्रचारित किया। परिणाम स्वरूप यहां पर अंधविश्वास का एक बड़ा मेला होने लगा और सैकड़ों की संख्या में यहां लोग कथित देवी के हाथ से जल ग्रहण करने आने लगे। लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने अंधविश्वास के इस बाजार का न सिर्फ पर्दाफाश किया बल्कि लोकरंग का आयोजन शुरू कर सिर्फ इसी गांव के ही नहीं, बल्कि आस-पास के दर्जनों गांवों के सांस्कृतिक माहौल को बदल देने का काम किया। आज जोगिया गांव की पहचान पानी पिलाने वाली देवी के गांव के रूप में नहीं, लोक संस्कृति की चिंता और इसके संवर्द्धन का कार्य करने वाले गांव के रूप में हो रही है।</p>
<p>लोकरंग 2015 की पहली रात, 12 अप्रैल को कार्यक्रम का शुभारम्भ 12 अप्रैल को रात नौ बजे प्रसिद्ध कथाकार एवं समयान्तर पत्रिका के सम्पादक पंकज बिष्ट ने ‘लोकरंग 2015’ पत्रिका के लोकार्पण से किया । इस मौके पर कहानीकार ऋषिकेश सुलभ, लोक संस्कृति के मर्मज्ञ तैयब हुसैन, चित्रकार डाॅ लाल रत्नाकर, वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन, डाॅ विजय चैरसिया, जितेन्द्र भारती, डाॅ महेश चन्द्र शांडिल्य, जनवादी लेखक संघ के प्रदेश सचिव नलिन रंजन सिंह, अरुण कुमार असफल आदि उपस्थित थे।<br />
लोकरंग का आगाज गांव की महिलाओं के रोपनी गीत- ‘सातों ही भईया के एक बहिना रुनवा हो, ए रामा सातांे भईया करेले रोपनिया हो ना’&#8230;. से हुआ। हर वर्ष गांव की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम से ही लोकरंग का आगाज होता है। रोपनी गीत मतिरानी देवी, ज्ञानती, लालती, सुभागी, रूक्मीणा और सुशीला ने गाया।<br />
इसके बाद गाजीपुर से आए बंटी वर्मा ने महेश्वर के लिखे गीत ‘सृष्टि बीज का नाश न हो &#8230;..’ और नरेन्द्र श्रीवास्व के भोजपुरी गीत ‘सारी जिनगी गुलामी में सिरान पिया, कहां गए विहान पिया ना’ प्रस्तुत किया। कुशीनगर जिले के लोक कलाकार ने निर्गुन प्रस्तुत किया और इसके बाद पश्चिम बंगाल के बर्द्धमान जिले से आए बरून दास बाउल, अजय दास, नयन अंकुश, काशीनाथ बायन, संजय मंडल और अनंत विश्वास ने प्रसिद्ध बाउल गान प्रस्तुत किया। बाउल गायकों के मधुर कंठ और उनके वाद्य यंत्रों की सम्मोहक धुन ने सबको अपने जादू में बांध लिया। बाउल गान की परम्परा भक्ति काल की परम्परा से जुड़ी हुई है। पूर्वी और पश्चिमी बंगाल आने-जाने वाले नौकाओं और जहाजों पर बाउल गायक मुसाफिरों को अपने गायन से भक्ति भाव में डूबो देते थे। उनके गायन में एक ओर राम-कृष्ण की भक्ति तो दूसरी तरफ कबीर का फक्कड़पन होता है।<br />
बाउल के बाद मध्य प्रदेश के देवास से आए दयानन्द सारोलिया और उनके साथियों ने कबीर व मालवी गायन प्रस्तुत किया। उन्होंने पहला गीत-‘ मै वारी जाउं रे, बलिहारि जांउ रे , मोरा सतगुर आंगन आया रे &#8230; अरी निर्मल हो गई काया ’ प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने कबीर के दो और भजन सुनाए।<br />
पहले रात का आखिरी कार्यक्रम था, नाटक- सुपनवा का सपना । यह नाटक इप्टा पटना की टीम ने किया। शाहिद अनवर लिखित एवं तनवीर अख्तर निर्देशित यह नाटक सुपनवा का सपना, इतिहास की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। सुपना का सपना महज यह है कि उसके भी पुरखों और संतानों का इतिहास हो न कि सिर्फ राजा-रजवाड़ों का। उसका यही सपना उसके जीवन में तमाम मुसीबतें लेकर आता है और अंत में जमींदार के साजिश से उसे फंासी हो जाती है। फांसी पर चढ़ने के पहले भी वह आम लोगों से सत्ता के खिलाफ उठ खड़े होकर एक नया इतिहास रचने का सपना देखता है।</p>
<p>लोकरंग की दूसरी रात खडि़या आदिवासी समूह के पारम्परिक नृत्य और इप्टा पटना की टीम द्वारा मंचित नाटक ‘ गबरघिचोरन के माई ’ के नाम रही। इन दोनों कार्यक्रमों के बीच भोजपुरी इलाके के कलाकारों ने लुप्त हो रही लोक कला ‘हुड़का’, ‘बाकुम’, ‘लोरिकायन’ प्रस्तुत किया।<br />
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे के नेतृत्व में आए कलाकारों ने खडि़या आदिवासी समुदाय का पारम्परिक करम नृत्य और बंदई नृत्य प्रस्तुत किया। करम नृत्य भादो एकादशी के समय मनाए जाने वाले त्योहार के समय होता है। इसमें आदिवासी करम राजा को मनाते हैं कि वह उनके घर आए और उन्हें सुख समृद्धि दें। इस नृत्य पर प्रस्तुत गीत का भाव था कि जैसे छोटी-छोटी नदिया समुद्र में मिलती हैं, उसी तरह हम अलग-अलग समुदाय से एक बड़े समुदाय और बड़े समाज का निर्माण करते हैं। दूसरा बंदई नृत्य, कार्तिक पूर्णिमा के समय प्रस्तुत किया जाता है। इसमें आदिवासी समाज अपने पशु धन के प्रति आभार व्यक्त करता है कि उसने अनाज को खेत से खलिहान और फिर घर लाने में मदद की। इन दोनों नृत्यों में राजेश डुंगडुंग काबा खडि़या, गांधी खडि़या, गिरजा खडि़या, विक्रांत केरकेट्टा, बुधेश्वर कुल्लू, बुधवा पाहन, निर्मला कुल्लु, प्रमिला टेटे, सुनीता कल्लू, अणिमा, रूबेन खडि़या, फगन खडि़या, फगन खडि़या, संगीता कुल्लू, अणिमा कुल्लू, बंसती कुल्लू, शांति कुल्लू, मीना डुंगडुंग, करमी खडि़या, अणिमा बिलुंग, संपति कुल्लू, कलावती खडि़या और वंदना टेटे शामिल हुए।<br />
कार्यक्रम की शुरुआत इप्टा की टीम द्वारा प्रस्तुत तीन गीतों से हुआ। इसके बाद बिहार के गोपालगंज जिले के पोखरापुर गांव से आए किशुन यादव ने ’लोरिकायन’ प्रस्तुत किया। कुशीनगर जिले के दहारी पट्टी गांव से आए भोला, विश्वनाथ, छेदी प्रसाद, झेंगड़, अलगू, रामरूप, गजाधर, शारदा, शिवमूरत, बिन्दू प्रसाद ने हुड़का प्रस्तुत किया। ये दोनों लोक कलाएं अब लुप्त होने के कगार पर हैं। मंच पर जब तीन कलाकार बाकुम प्रस्तुत करने आए तो दर्शक उनके विचित्र वस्त्र विन्यास और वाद्य यंत्र देख हैरत में पड़ गए। तीनों कलाकारों ने अपने चेहरे को गुदरी, जिसमें रंग-बिरंगी कौडि़यां टांकी गई थीं, से ढंक रखा था। हाथ में डंडा और झुनझुना जैसा खन-खन बजने वाला वाद्य यंत्र था। इन कलाकारों ने अपनी अनोखी लोक शौली में स्वरचित कविताएं पढते हुए भ्रष्टाचार और जाति व्यवस्था पर करारे तंज किए। कप्तानगंज, कुशीनगर से आए कौव्वाल असगर अली और उनके साथियों ने ‘छाप तिलक सब छीनी रे &#8230;’ और दो अन्य कव्वाली प्रस्तुत की।<br />
कार्यक्रम की आखिरी प्रस्तुति थी इप्टा पटना का नाटक ‘गबरघिचोरन के माई’। यह नाटक निर्देशक तनवीर अख्तर ने भिखारी ठाकुर के दो नाटकों बिदेशिया और गबरघिचोर को मिलाकर तैयार किया है। नाटक गबरघिचोरन के माई की जानदार प्रस्तुति ने लोगों का दिल जीत लिया। इस नाटक में स्त्री पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर के निर्देशन में मंचित इस नाटक में युवक गलीच अपनी व्याहता को छोड़ कलकत्ता चला जाता है और 15 वर्ष तक कोई खोज-खबर नहीं लेता है। इस बीच उसकी पत्नी बच्चे को जन्म देती है। जब गलीज लौटकर आता है तो किशोर हो चुके अपने बेटे को कलकत्ता ले जाने की कोशिश करता है लेकिन उसकी पत्नी उसका विरोध करती है। गबरघिचोर भी मां को छोड़कर परदेश जाने से मना करता है। तभी गांव का एक दूसरा व्यक्ति गड़बड़ी गबरघिचोर को अपना बेटा बताता है। इसको लेकर पंचायत होती है और पंच बने भिखारी ठाकुर गबरघिचोर पर मां का हक बताते हुए उसके पक्ष में फैसला देते हैं। नाटक के कई प्रसंग बहुत मार्मिक थे जिसने दर्शकों को भावुक कर दिया।<br />
लोकरंग के दूसरे दिन बाहर से आए अतिथि साहित्यकारों, कलाकारों और रंगकर्मियों को लोकरंग सांस्कृतिक समिति की ओर से स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मान किया गया।</p>
<p>लोकरंग कार्यक्रम के दूसरे दिन, प्रति वर्ष विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया जाता है । इस वर्ष की गोष्ठी का विषय था-लोक संस्कृति का वर्तमान और भविष्य’ ।</p>
<p>‘लोक संस्कृति को बचाना जीवन को बचाना है’-पंकज बिष्ट</p>
<p>‘लोक कलाओं का सम्बन्ध गांव और जीवन से है। लोक कलाएं जीवन के हर हिस्से से अभिव्यक्त होती हैं। उत्पादन के सम्बन्ध से कलाओं का घनिष्ठ सम्बन्ध है। जैसे-जैसे उत्पादन के साधन बदल रहे हैं, लोक कलाओं में भी बदलाव आ रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में लोक संस्कृति और लोक कलाओं को बचाना बहुत मुश्किल होता है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों को बदले बिना हम लोक संस्कृति और लोक कलाओं के संरक्षण और विकास का काम नहीं कर पाएंगे। ’<br />
यह बातें लोकरंग समारोह के दूसरे दिन ‘लोक संस्कृति का वर्तमान और भविष्य’ पर आयोजित विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार एवं समयान्तर के सम्पादक पंकज बिष्ट ने कहीं। उन्होंने लोकरंग के उद्घाटन के समय कहे अपने को दुहराते हुए कहा कि आज हम कई तरह के संकटों के दौर से गुजर रहे हैं। यह समय लोक कलाओं के पतन का है। लोक कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कृत्रिम रूप से गढ़ी नहीं जाती हैं बल्कि हमारी जीवन शैली से प्रेरणा पाकर हमारे जीवन और जीवन संघर्ष को अभिव्यक्त करती हैं। लोक कलाओं और लोक संस्कृति को बचाने का तात्पर्य है अपने जीवन और जीवन शैली को बचाना।<br />
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पटना से आए लोेक संस्कृति के मर्मज्ञ तैयब हुसैन ने कहा कि लोक संस्कृति में हमें उस हर तत्व को लेना चाहिए जिसका आधार ऐतिहासिक हो और वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न हो। लोक संस्कृति में जो भी प्रगतिशील हो उसे ढूंढकर सामने लाने की जरूरत है। उन्होंने लोक संस्कृति में मिथकों के खतरे के प्रति आगाह किया। जनवादी लेखक संघ के प्रदेश सचिव नलिन रंजन सिंह ने लोक साहित्य के संकलन का काम न होने पर चिंता जताते हुए कहा कि बहुत नाउम्मीद होने की जरूरत नहीं है। लोक नृत्य, लोकगीत, लोक गाथा में नवोन्मेष भी दिखाई दे रहा है भले ही कम क्यों न हो। उन्होंने लोक साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को रेखांकित करते हुए कहा कि नए विमर्शो में नए पड़ताल के साथ लोक संस्कृति को जोड़ेंगे तो भविष्य उम्मीद भरी होगी।<br />
झारखंड से झारखंडी भाषा साहित्य, संस्कृति अखड़ा की वंदना टेटे ने झारखंड के पांच बड़े आदिवासी समूहों में से एक खडि़या आदिवासी समूह की संस्कृति का विस्तृत परिचय देते हुए कहा कि हमारे समाज में रंग औरा लिंग भेद नहीं है और यह जीवन दर्शन हमने सृष्टि के सानिध्य में पाया है। जंगल और जमीन हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है और इसको खत्म करना हमारी संस्कृति को खत्म करना है। रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो दिनेश कुशवाहा ने कहा कि लोक संस्कृति का विकास सत्ता की संस्कृति के प्रतिरोध में हुआ। लोक ने अपने किस्से-कहानियों, गीतों, नृत्यों के साथ-साथ लोक विश्वासों और लोक आस्थाओं में भी लोक संस्कृति प्रकट हुई। लोक अनुभव जन्य ज्ञान को शास्त्र और वेद से आगे माना गया है। इसके बावजूद लोक संस्कृति में सब कुछ अच्छा नहीं है। नब्बे फीसद लोक विश्वास झूठ पर आधारित हैं क्योंकि ये अनुभव जन्य लोक ज्ञान से अलग से आए हैं। इन लोक विश्वाासों, आस्थाओं की पुनव्र्याख्या करनी होगी और उनको वैज्ञानिक स्वरूप देना होगा। वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि लोक़ संस्कृति के वर्तमान में दुख-दर्द, पीडा, संघर्ष का बयां तो है लेकिन मुक्ति का संकेत नहीं दिखायी देता। लोक संस्कृति की बात करते हुए कुछ लोग इसे जैसा है वैसा बने रहने की बात कर रहे जो बहुत घातक है। उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा से आंख नहीं चुराने की नसीहत देते हुए कहा कि लोक संस्कृति का निर्माण द्वंदात्मक है। वरिष्ठ पत्रकार दयानन्द पांडेय ने कहा लोक संस्कृति मंचों और समारोहों से नहीं बचेगी। इसे हमें अपने घरों में जगह देनी होगी। उन्होंने लोक भाषाओं के खत्म होने पर चिंता जताते हुए कहा कि लोकभाषा को विद्वान नहीं बनाते, बाजार और रोजगार बनाते हैं। लोकभाषा का सम्बन्ध रोजी-रोटी से जोड़ना होगा। उन्होंने बाजार और भूमण्डलीकरण का अंध विरोध करने के बजाय इसको साथ में लेने की जरूरत पर जोर दिया। कहानीकार हृषिकेश सुलभ ने कहा कि जो हमारे काम का नहीं है उसे हम शव की तरह लादे नहीं रह सकते। हमारे समय का आख्यान बदल रहा है लेकिन जीवन का मौलिक भाव कभी नहीं बदलता। आज भी ऐसे गीत लिखे जा रहे हैं जो सत्ता, शोषण के प्रतिरोध में खड़े हैं। सुप्रसिद्ध चित्रकार डाॅ लाल रत्नाकर ने कहा कि उन्नत कला का लयात्मक स्वरूप लोक से आया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश लोक कलाओं के लिए बहुत ही समृद्ध है। हमें लोक कलाओं के संरक्षण और विकास के लिए बहुत काम करने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चैधरी ने कहा कि लोक जन में घनघोर निराशा है। लाखों की संख्या में किसान आत्महत्या रहे हैं फिर भी हुक्मरान कह रहे हैं कि देश विकास कर रहा है। हमारी चिंता इस बात की है कि जिसके बल पर हम लोक संस्कृति के विकास की बात कर रहे हैं वहीं संकट में है। आदिवर्त संग्रहालय खजुराहो के कार्यक्रम अधिकारी डा महेश चन्द्र शांडिल्य ने लोक संस्कृति के क्षरण के लिए मध्यवर्ग के उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया। डा विजय चैरसिया ने बैगा आदिवासियों की संस्कृति की विस्तार से चर्चा की । पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति को बचाने और उसके विकास की लड़ाई किसान, खेती, प्राकृतिक संसाधनों की कार्पोरेट लूट से बचाने की लड़ाई से अलग नहीं है। कार्पोेरेट विकास में गांव, किसान, खेत, जल, जंगल, जमीन नहीं बचेंगे तो हम लोक संस्कृति को कैसे बचा पाएंगे। उन्होंने लोक संस्कृति के संरक्षण के कार्य में रूमानियत से बचने की सलाह देते हुए कहा कि लोककलाओं में बहुत से फार्म को बचाने की चिंता गैर जरूरी है क्योंकि ये स्त्रियों के शोषण से जुड़े हुए हैं। विचार गोष्ठी का विषय प्रवर्तन राम प्रकाश कुशवाहा ने किया। संचालन बलरामपुर से आए साहित्यकार पी.सी. गिरि ने किया। विचार गोष्ठी के प्रारम्भ में इप्टा पटना की टीम ने दो गीत प्रस्तुत किए।</p>
<p>प्रस्तुति<br />
मनोज कुमार सिंह<br />
559 एफ, विजय विहार, राप्तीनगर, फेज-1, गोरखपुर<br />
9415282206</p>
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		<item>
		<title>लोकरंग 2014, एक यादगार आयोजन</title>
		<link>https://lokrang.in/lokrang-2014-an-event-to-remember/565/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:54:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोकरंग 2014, एक यादगार आयोजन कुशीनगर के एक साधारण से गांव, जोगिया जनूबी पट्टी में लोकरंग 2014 का भव्य और शानदार आयोजन, देश स्तर का शायद पहला आयोजन कहा जा सकता है, जहां लोक संस्कृतियों को सहेजने, उनके सामाजिक और जनपक्षधर स्वरूप को मंच पर प्रस्तुत कर, फूहड़पन के विरुद्ध एक अभियान चलाने जैसा पहल...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लोकरंग 2014, एक यादगार आयोजन</p>
<p>कुशीनगर के एक साधारण से गांव, जोगिया जनूबी पट्टी में लोकरंग 2014 का भव्य और शानदार आयोजन, देश स्तर का शायद पहला आयोजन कहा जा सकता है, जहां लोक संस्कृतियों को सहेजने, उनके सामाजिक और जनपक्षधर स्वरूप को मंच पर प्रस्तुत कर, फूहड़पन के विरुद्ध एक अभियान चलाने जैसा पहल लिया गया है । जोगिया गांव विगत सात सालों से लोक-उत्सव का रूप ले चुका है । आकर्षक ढंग से भित्ति चित्रों से सजे जोगिया गांव के विशाल मुक्ताकाशी मंच पर लोकरंग-2014 में दो रात लोक नृत्य और गायकी के विभिन्न रूपों की प्रस्तुति के साथ-साथ ‘अमली’ और ‘चरणदास चोर’ नाटक देखने का मौका हजारों की संख्या में ग्रामीण जनता को मिला। इस बार मंच पर पंवारा और मुहर्रम के दौरान गाए जाने वाले जारी गीत की किसी मंच पर पहली प्रस्तुति भी हुई। गोबर और मिट्टी से डिजाइन किए गए मंच को आकर्षक स्वरूप प्रदान किया था, गाजीपुर से आये राजकुमार सिंह की टीम ने ।</p>
<p><span id="more-565"></span></p>
<p>पहली रात, 27 मई<br />
सातवें लोकरंग समारोह का शानदार आगाज 27 मई की रात नौ बजे हुआ। प्रख्यात कवि डा. केदारनाथ सिंह ने समारोह का उद्घाटन और लोकरंग स्मारिका का विमोचन किया। इस मौके पर मंच पर जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण, बीएचयू के हिन्दी के प्रोफेसर सदानन्द शाही, वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन, आगरा से आए वरिष्ठ रंगकर्मी डा. बिरजू, बाल्मीकि महतो, अमर उजाला गोरखपुर के सम्पादक प्रभात सिंह, बी.आर.डी. मेडिकल कालेज के प्राचार्य प्रो. के.पी. कुशवाहा उपस्थित थे।<br />
लोकरंग का उद्घाटन करते हुए डा. केदारनाथ सिंह ने कहा कि लोकरंग के आयोजन को वह एक बड़ी सांस्कृतिक घटना के रूप मेें देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अपने गांव चकिया से जोगिया गांव आए हैं और यहां आना बहुत अच्छा लग रहा है। उन्होंने इस जिले में 14 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया है। आज से 40 वर्ष पहले उनको इस जिले को छोड़कर नई दिल्ली जाना हुआ। आज वह अपनी मिट्टी को यहां प्रणाम करने आए हैं। केरल के एक गांव में वर्ष 1980 में हुए बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम को याद करते हुए उन्होंने कहा लोकरंग जैसे आयोजन की अनुगंूज जल्द ही पूरे हिन्दी पट्टी में सुनाई देगी।<br />
इसके पहले लोकरंग समारोह के आयोजक लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और इस वर्ष के आयोजन की रूपरेखा रखी। कार्यक्रम के उद्घाटन व स्मारिका के विमोचन के बाद सबसे पहला कार्यक्रम सोहर गायन का हुआ जिसे गांव की ही मनीषा, निशा, अंकिता, रूचि, गरिमा और संगीता ने प्रस्तुत किया। गांव की लड़कियां और महिलाएं हर वर्ष लोक कला का कोई न कोई रूप यहां प्रस्तुत करती रही हैं। इस बार गांव के युवाओं ने एक नाटक ‘बाबागिरी’ प्रस्तुत किया। यह नाटक ढोंगी बाबाओं और मीडिया पर करारा व्यंग्य करता है। इस नाटक को गांव के युवाओं ने 15 दिन के नाटक वर्कशाप में तैयार किया था। युवाओं को अभिनय का प्रशिक्षण राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से आए घनश्याम और राकेश साहू ने दिया था। पहली रात का मुख्य आकर्षण नागेश्वर यादव और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत फरूआही रही। पहली बार इस फरूआही में जनगीत का प्रयोग किया गया। फरूआही नृत्य प्रस्तुत करने वाले कलाकारों ने माई रे माई बिहान होई कहिया, भेडि़यन से खाली सिवान होई कहिया व जाग जाग अब तू मजूर भइया गीत पर जबर्दस्त नृत्य किया और फरूआही की परम्परा के मुताबिक नृत्य करते हुए शारीरिक कौशल के कई हैरतअंगेज करतब दिखाए। बिहार के गोपालगंज जिला के पड़रिया गांव से आए भोला दास ने संत कबीर के निर्गुन गाकर लोगों का दिल जीत लिया। देवरिया जिले के नौतन हथियागढ़ गांव से आए शिक्षक जितेन्द्र प्रजापति ने क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय के गीतों को गाकर लोगों में जोश भर दिया। हर वर्ष की परम्परा के मुताबिक 27 मई की रात एक नाटक का मंचन हुआ। कला जागरण मंच, पटना की टीम ने हृषिकेश सुलभ रचित नाटक ‘अमली’ का मंचन किया। नाटक का निर्देशन सुमन कुमार ने किया। अमली नाटक सामंती शोषण और अत्याचार में पिसती स्त्री ‘अमली’ की गाथा है जो गांव के दो सामंतों के हर तरह के शोषण की शिकार होती है। दोनों सामंत उसकी जमीन को हड़प लेते हैं और जमीन हड़पने की होड़ में वे गांव के माहौल को साम्प्रदायिक बना देते हैं और फिर आपस में समझौता कर अमली को बदचलन करार दे उसे गांव से बाहर खदेड़ देते हैं।</p>
<p>28 मई को प्रातः 11 बजे से गांव में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था-‘लोक नाट्यों की परम्परा और परिवर्तन की आवश्यकता ‘ । गोष्ठी में हस्तक्षेप करते हुए जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि नौटंकी के माध्यम से सबसे गरीब लोगों के नायकत्व को सामने लाना होगा । उन्होंने कहा कि लोक नाट्य स्वभावतः अपने आपको बदलते रहता है। यह अपने सामाजिक व राजनीतिक परिवेश के अनुसार अपने को अनुकूलित करता है और लोक से तत्व ग्रहण करता है लेकिन आज लोक नाट्य को गरीब लोगों की जिंदगी को अभिव्यक्ति करने के लिए लोक रूपों की तलाश करनी होगी। सतत बदलाव के बीच अपने को रखते हुए सचेत रूप से सबसे ज्यादा गरीब लोगों के नायकत्व को सामने लाना ही आज सही दिशा है। उन्होंने कहा अभी हुए चुनाव में चुने गए लोकसभा के 543 सांसदों में से 442 करोड़पति हैं तो दूसरी तरफ 30 करोड़ लोग सिर्फ 30 रुपए रोज पर गुजारा करने पर विवश हैं। इस चुनाव में पूंजी की सत्ता को घर-घर पहुंचाने का एक बड़ा नाटक खेला गया। पूंजी की सत्ता वेष बदलकर गरीब आदमी बन कर घूम रही है ताकि लोग यह नहीं देख सकें कि उसे किसने खड़ा किया है। पूंजी की सत्ता ने एक बेहतर नाटक पेश किया है। हमें इस चुनौती को स्वीकार करते हुए करोड़ों गरीब जनता की आवाज बनने का काम करना होगा। लोक नाट्य को भविष्य के भारत, हमारे अरमानों, सामाजिक वंचना के शिकार, साम्प्रदायिक चेतना के हमले के शिकार लोगों की आवाज बनाना होगा। उन्होंने लोकरंग के आयोजन को बड़े सांस्कृतिक आंदोलन में बदलने की जरूरत पर बल दिया।<br />
बिहार से आए संस्कृतिकर्मी बाल्मीकि महतो ने कहा कि लोक नाट्य में अभी सिर्फ प्रदर्शन के क्षेत्र में कार्य हो रहा है। शोध और सृजन का बुनियादी काम कमजोर है। आज लोक नाट्य में जो परिवर्तन हो रहे हैं वह सकारात्मक नहीं है। जनता की चेतना को उन्नत करने के उद्देश्य से इसमें परिवर्तन होना चाहिए न कि इसे कुंद करने के लिए। पत्रिका ‘लेखन’ के सम्पादक मोतीलाल ने कहा कि लोक नाट्य जिसकी जरूरत है, वही रचता है, वही उसका भागीदार होता है और वही उसे देखता है। लोक नाट्य के बिना लोक में प्रवेश नहीं किया जा सकता। उन्होंने लोक नाट्य पर बाजार के हमले के प्रति सचेत किया।<br />
भगवान महावीर पी.जी. कालेज फाजिलनगर के हिन्दी के विभागाध्यक्ष डा मुन्ना तिवारी ने कहा कि लोक की चेतना कहती कम है, सम्पे्रषित ज्यादा करती है। यह अनुकरणीय के बजाय अनुकीर्तन करती है। आज लोक नाट्य का महत्व लोक में कम हुआ है और वह लोक से कटता जा रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है। बेगूसराय से आए रंगकर्मी दीपक सिंह ने लोकगायन में अश्लीलता के मुद्दे को उठाया और कहा कि लोक नाट्य की जमीनी ताकत को पहचानने और उसे परिमार्जित करने के लिए काम करने की जरूरत है। वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि लोक नाट्य में सृजनात्मक स्तर पर ठहराव आया है। बाजार इसे हाईजैक करने की कोशिश कर रहा है। लोक कला को समृद्ध और विकसित करने की चुनौती पहले से और कठिन हुई है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चैधरी ने कहा कि लोक नाट्यों पर ही संकट नहीं है हमारे पूरे जीवन पर हमला हो रहा है। हमारे दिमाग को पूंजी की सत्ता अपने हिसाब से बनाने की कोशिश कर रही है। टेलीविजन, सिनेमा में एक अभासी जीवन, परिवार को गढ़ा जा रहा है और उसे वास्तविक बना देने की कोशिश हो रही है। यह एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है।<br />
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे आगरा से आए रंगकर्मी डा. बृज बिहारी वर्मा बिरजू ने विस्तार से लोक नाट्यों की परम्परा का जिक्र करते हुए कहा कि नौटंकी लोक नाट्य की प्रमुख विधा है जिसमें समाज द्वारा बहिष्कृत स्त्रियां प्रमुख भूमिका में होती हैं। उन्होंने सिनेमा, दूरदर्शन को लोक नाट्य के अस्तित्व के लिए अवरोधक बताया और लोक नाट्य में इस दौर में जो परिवर्तन होगा वह दलित, सर्वहारा वर्ग और स्त्रियों के भीतर से और उनकी जीवन स्थितियों के अनुरूप ही होगा।<br />
गोष्ठी का संचालन करते हुए अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रोफेसर गोपाल प्रधान ने कहा कि नाटक एक हद तक स्थापित सत्ता के लिए चुनौतीपूर्ण रही है। लोक मंे उत्पत्ति के बावजूद लोक नाटकों को आम जन से बहिष्कृत करने की कोशिश की गई जिसका प्रतिरोध लोक नाट्य आज भी कर रहा है। लोक नाट्य की परम्परा प्रतिरोध की परम्परा रही है। लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।</p>
<p>28 मई की रात<br />
लोकरंग समारोह की दूसरी रात सबसे पहले स्थानीय गायक विशाल कुमार गौड़ ने दो जनगीत प्रस्तुत किए। उन्होंने अपने गायकी से सबको प्रभावित किया। इसके बाद मीर बिहार गांव से आए सूर्यभान कुशवाहा और उनके साथियों ने भोजपुरी क्षेत्र का लोकप्रिय चइता गीत सुनाया। भोजपुरी इलाके में साल के बारह महीनों में अगल-अलग गीत गाने की परम्परा रही है जिसमें चैत महीने में चइता गाया जाता है। गाजीपुर से आए सत्येन्द्र कुमार और उनके साथियों ने बिरहा गाया। उन्होंने अपने गीत में शिक्षा के महत्व के साथ-साथ आज की युवा पीढ़ी द्वारा बुजुर्गों की उपेक्षा की व्यथा को व्यक्त किया। बलिया से आए संकल्प संस्था के शैलेन्द्र मिश्र ने दो गीतों के माध्यम से महंगाई, सत्ताधीशों की मनमानी पर व्यंग्य किया तो भ्रूण हत्या पर एक मार्मिक गीत सुनाकर सबको द्रवित कर दिया। उन्होंने अदम गोंडवी का गीत ‘तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,’ भी गाया।<br />
दूसरी रात की सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तुतियां थी-पंवारा गायन और मुहर्रम में गाया जाने वाला जारी गीत। कुशीनगर जिले के ही सिसवा नहर गांव से आए पंवारा गायकों शमसुद्दीन, शबीर, हरीफ, मुमताज और उनके साथियों ने पंवारा गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया। पंवारा गायक अल्पंसख्ययक समुदाय से आते हैं और वे बच्चों के जन्म पर बधाई गीत गाते हुए गोल-गोल घूमते हुए नृत्य करते हैं। उनके हाथ में बहुत छोटा एकतारा जैसा वाद्य यंत्र होता है जिसे तुतही कहा जाता है। पंवारा गायकी को आज भी इस इलाके के कई गांवों में अल्पंसख्यक समुदाय के लोगों ने संजो कर रखा है। पंवारा गायकी इन कलाकारों के लिए आजीविका भी है। जोगिया गांव के विशाल मुक्ताकाशी मंच पर पंवारा गायकों ने अपने गीत में एक निसंतान महिला के दुख को व्यक्त किया। दीना पट्टी गांव से आए आबिद अली, कलीमुल्लाह, जहीर, साजिद और उनके साथियों ने मुहर्रम के दौरान गाया जाने वाला जारी गीत प्रस्तुत किया। इसे स्थानीय लोग झारी भी कहते हैं। झारी गीत की मंच पर यह पहली प्रस्तुति थी। दोनों गीतों के गायन करने वाले लोक कलाकारों को दर्शकों से खूब सराहना मिली।<br />
आखिरी कार्यक्रम के रूप में बिहार के बेगूसराय से आयी रंगनायक संस्था ने चर्चित नाटक चरणदास चोर का मंचन किया। प्रख्यात नाटककार हबीब तनवीर लिखित यह नाटक चरणदास नाम के एक ऐसे चोर की कहानी है जिसने सच बोलने का प्रण लिया था और सच बोलते हुए वह सत्ता के सभी प्रलोभनों को ठुकरा देता है जिसके बदले उसे मौत की सजा मिलती है। यह नाटक पूंजीवादी व्यवस्था और भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलता है। रंगनायक की टीम ने इस नाटक को विदेसिया शैली में मंचित किया। नाटक के संवाद भोजपुरी और हिन्दी में तैयार किए गए थे। सचिन कुमार द्वारा निर्देशित इस नाटक में चरणदास चोर की भूमिका में मोहित मोहन ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। नाटक के अन्य मुख्य कलाकार देवेन्द्र कुमार, कुणाल भारती, अवनीश कुमार, राजू रंजन, सूर्य प्रकाश, अंकिता सिन्हा थे। नाटक की परिकल्पन व डिजाइन वरिष्ठ रंगकर्मी दीपक सिन्हा ने किया था।<br />
लोकरंग के आयोजन लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने अंत में कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी दर्शकों, बाहर से आए बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों व कलाकारों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।<br />
इस प्रकार चैरीचैरा विद्रोह के विद्रोही किसानों को समर्पित सातवंे लोकरंग समारोह में विभिन्न स्थानों से आए साहित्यकारों, लेखकों और सैकड़ों लोक कलाकारों ने भाग लिया। इनमें जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण, अम्बेडकर विश्वविद्यालय नई दिल्ली मंे शिक्षक गोपाल प्रधान, बीएचयू में प्रोफेसर सदानंद शाही, ताहिरा हसन, वरिष्ठ कहानीकार मदनमोहन, कथादेश के सम्पादक हरिनारायण, रंगकर्मी डा. बृजबिहारी लाल वर्मा बिरजू, बाल्मीकि महतो, ‘लेखन’ पत्रिका के संपादक मोतीलाल मौर्य , दीपक सिन्हा, अमर उजाला के संपादक प्रभात कुमार, कामिल खान, अशोक चैधरी, जसम के सचिव मनोज कुमार सिंह के अलावा बी.आर.डी. मेडिकल कालेज के प्राचार्य प्रो. के.पी. कुशवाहा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। गोष्ठी का संचालन गोपाल प्रधान ने और दोनों रात सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन श्री भगवान महावीर पीजी कालेज के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डा. मुन्ना तिवारी ने किया ।</p>
<p>मनोज कुमार सिंह<br />
वरिष्ठ पत्रकार<br />
559 एफ, विजय विहार, राप्तीनगर फेज-1, गोरखपुुर 273003</p>
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		<title>लोकसंस्कृति के संरक्षण का अनूठा प्रयास &#8211; Lokrang 2013</title>
		<link>https://lokrang.in/unique-effort-to-preserve-folk-culture/563/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:53:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोकसंस्कृति के संरक्षण का अनूठा प्रयास गोरखपुर से कुशीनगर होते हुए बिहार जाने वाले नेशनल हाइवे पर फाजिलनगर कस्बे से जो सड़क दक्षिण की तरफ मुड़ती है वह जोगिया गांव ले जाती है। यह नेशनल हाइवे अब फोर लेन बाईपास में बदल चुका है। अब इस पर गाडियां 100 किमी से भी ज्यादा रफतार से...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लोकसंस्कृति के संरक्षण का अनूठा प्रयास</p>
<p>गोरखपुर से कुशीनगर होते हुए बिहार जाने वाले नेशनल हाइवे पर फाजिलनगर कस्बे से जो सड़क दक्षिण की तरफ मुड़ती है वह जोगिया गांव ले जाती है। यह नेशनल हाइवे अब फोर लेन बाईपास में बदल चुका है। अब इस पर गाडियां 100 किमी से भी ज्यादा रफतार से दौडती हैं। इस पर गुजरने वाले लोगों को इंडिया के विकास का फील गुड हो सकता है। पर यदि आप वह इस फोरलेन हाइवे से उतर कर गांवों की तरफ बढें तो आपको दूसरी तरफ की सचाई का पता लगेगा जो इस देश की अस्सी फीसदी जनता की सचाई है। फिलहाल बात जोगिया गांव की हो रही है। यह गांव पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूसरे गांवों जैसा ही है। हाइवे से उतर कर गांव जाने के लिए आपके पास यदि अपना साधन नहीं है तो पैदल चलना पडेगा। गांव की सड़क एक छोटी नहर के समानान्तर आगे बढती है जिसमें कभी -कभार ही पानी दिखाई देता है हालांकि दो वर्ष पहले मनरेगा के पैसे से इसकी झराई का काम हो चुका है। पांच वर्ष पहले जनसंस्कृति मंच के सहयोग से इस गांव के निवासी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने लोकरंग नाम का वार्षिक कार्यक्रम शुरू किया था। उद्देश्य यह था कि लोकसंस्कृति का संरक्षण करते हुए उसका विकास किया जाय और भोजपुरी के नाम पर जो फूहड़पन का प्रचार हो रहा है उसका प्रतिकार किया जाय। यह आसान काम नहीं था लेकिन गांव में ऐसे लोगों की एक टोली थी जो अपने तई लगातार गांव में कुछ न कुछ नया करने का प्रयास करती रहती थी । चाहे वह पुस्तकालय संचालित करने की बात हो, साहूकारों के चंगुल में फंसे गरीबों को मुक्त कराने का काम हो, गरीब छात्रों को पढ़ाई के लिये प्रेरित करने के लिये छात्रवृत्ति प्रदान करने की बात हो या कुछ शातिर लोगों द्वारा मानसिक रूप से गांव की एक बीमार महिला को देवी घोषित कर उसके आशीर्वाद से असाध्य बीमारियों और लोगों के हर तरह के कष्ट दूर हो जाने की अफवाह फैलाकार महीनों तक भारी जमावड़ा कर धनउगाही के षडयंत्र का पर्दाफाश करने का मामला रहा हो।</p>
<p>पहला लोकरंग कार्यक्रम वर्ष 2008 में हुआ। इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के उन लोकगीतों, लोक नृत्यों, लोककलाओं को मंच दिया गया जो अब गायब हो रहे हैं। साथ ही इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रही जनवादी चेतना से लैस सांस्कृतिक टीमों को बुलाया गया था। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए। कार्यक्रम स्थल के रूप में गांव के ही एक नौजवान मंजूर अली के घर के अहाते का चयन किया गया। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए गांव के लोग ही नहीं बल्कि आस-पास के लोग भी उमड़ पड़े।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; तीन आयोजनों के बाद ही कार्यक्रम स्थल छोटा पड़ने लगा तो सुभाष चन्द्र कुशावाहा ने गांव के किनारे अपनी जमीन इस काम के लिए दे दी और यहां पर एक विशाल मंच और कलाकारों के ठहरने के लिए दो हाल भी बन गए। इस जगह पर&nbsp; पिछले दो वर्ष से लोकरंग में हिस्सेदारी के लिए हजारों लोग आते हैं। इस वर्ष यह आयोजन 12 और 13 मई को हुआ। लोकरंग का उद्घाटन प्रख्यात आलोचक एवं जनसंस्कृति मंच के राष्टीय अध्यक्ष मैनेजर पांडेय ने किया। इस अवसर पर प्रो मैनेजर पांडेय, जनसंस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, महासचिव प्रणय कृष्ण, आलोचक रविभूषण ने लोकरंग की स्मारिका का लोकार्पण भी किया। पहला कार्यक्रम जंतसार गीत था जिसे गांव की ही मतिरानी, शान्ति और अन्य महिलाओं ने प्रस्तुत किया। मंच पर जांता पर गेहूं पीसते हुए इन महिलाओं ने अपने गीत में विदेश गए पिया से अपनी व्यथा के कहन को पिरोया था। जंतसार के बाद कुशीनगर जिले के माधोपुर सेखवनिया गांव के रामवृक्ष कुशवाहा और उनके सहयोगियों ने फरूआही नृत्य प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति की सबसे खास बात यह रही कि इसमें नर्तक धर्मवीर, मुकेश, सतेन्द्र, सनी किशोर वय के थे और उन्होंने गोरख पांडेय के मशहूर गीत जनता के आवे पलटनिया पर झूमकर नृत्य किया जिसको बिरहा के तर्ज पर गाया गया था। फरूआही से मिलता-जुलता लोकनृत्य अहिरउ है जिसे छेदीलाल यादव और उनकी टीम ने प्रस्तुत किया। बलिया से आई सांस्कृतिक संस्था संकल्प ने भोजपुरी के परम्परागत गीतों की शानदार प्रस्तुति से सबका दिल जीत लिया। विदेशिया नाटक की प्रस्तुति के लिए काफी सुर्खिया बटोर चुकी इस टीम ने हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना पर आधारित एक नाटक मै नरक से बोल रहा का भी मंचन किया। इस नाटक में उपभोक्तावादी संस्कृति पर चोट की गई है। पटना से आई सांस्कृतिक टीम डिवाइन सोशल डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन ने मेहरारू की दुर्दशा नामक नाटक का मंचन किया। इस नाटक में शोषण व अन्याय के खिलाफ नारी के प्रतिकार को स्वर दिया गया है। नाटक का निर्देशन सुमन कुमार ने किया था। हिरावल ने गोरख पांडेय, रमता जी, रामकुमार कृषक के जनगीतों को गाया। दूसरे दिन प्रातः 11 बजे से विचारगोष्ठी&nbsp; प्रारंभ हुई । लोकरंग में हर वर्ष संगोष्ठी भी होती है। इस बार का विषय ‘वैश्वीकरण में लोक संस्कृति का उज़ना’ रखा गया था। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो मैनेजर पांडेय ने की। उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा कि लोक संस्कृति प्रकृति के साथ रची बसी होती है। जब जब मनुष्य पर प्रहार होता है वह प्रकृति की शरण में जाकर उससे सांत्वना पाता है, उससे साहस और ऊर्जा पाता है। इसके बरक्स आभिजात्य संस्कृति व साहित्य परलोकवादी है। जब-जब उसकी प्राणधारा सूख जाती है तो वह लोकरूपों से ही ताकत ग्रहण करती है। लोक की रक्षा कर ही लोक संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। उन्होंने कहा कि भूमण्डलीकरण के इस दौर में पूंजी के भूमण्डलीकरण के साथ साथ पूरी दुनिया का अमेरिकीकरण की भी कोशिश चल रही है। दरअसल अमेरिका की कोई लोकसंस्कृति है ही नही। वहां जो लोकसंस्कृति है, वह अश्वेतों की है, जो अफ्रीका से दास बनाकर अमेरिका लाए गए। इसे अपने जीवन&nbsp; को बचाने की जद्दोजहद में रचा गया है। पूंजीवाद की विचारधारा में मनुष्य का कोई सम्मान नहीं है। इस व्यवस्था में हर कमजोर को मजबूत खा जाता है। पूंजीवाद में सिर्फ सफल व्यक्ति की कीमत है, सार्थक आदमी की नहीं। उन्होंने कहा कि संस्कृतिकर्मियों को अपना दायित्व तय करना है और जनता को उसकी अपार शक्ति का अहसास दिलाने का काम करना है। इस देश की जनता ने अंग्रेजीराज को पराजित किया, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद का भी सामना कर सकती है। आरंभ में आधार वक्तव्य देते हुए आलोचक रविभूषण ने कहा कि भूमण्डलीकरण पूरे लोक पर प्रहार करता है। यह हमारी बोली-भाषा, पहनावे से लेकर गीत-संगीत, साहित्य किसी को नहीं छोड़ता। विश्व पूंजी का श्रम से कोई संबंध नहीं। इसके जरिए हमारी संस्कृति को तबाह कने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि सम्मान, आजादी, रोजी-रोटी के लिए जनता द्वारा किए जा रहे संघर्षों से ही बचेगी। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने कहा कि सिर्फ लोक संस्कृतियों के संरक्षण से ही नहीं चलेगा। बल्कि परिवर्तन के संघर्ष को उद्वेलित करने में इसकी भूमिका देखी जानी चाहिए। इसके लिए हमें जनसंघर्षों से जु़ड़ना होगा। रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष दिनेश कुशवाह ने दो कविताओं&nbsp;के जरिए अपनी बात की। पत्रकार अशोक चौधरी ने कहा कि लोकसंस्कृति को लोक ही गढ़ता है और वही उसे बचाता भी है। अखिल&nbsp; भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसियेशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने भूमण्डलीकरण के दौरान किसानों की आत्महत्याओं, साम्प्रदायिक नरसंहार की घटनाओं का उल्लेख करते हुए इसके खिलाफ जनसंघर्षों को रेखांकित किया। भोजपुरी साहित्य के विशेषज्ञ डा तैयब हुसेन ने कहा कि हमेशा याद रखना चाहिए कि लोकसंस्कृति ने हर संकट के समय अपने स्तर पर ल़ड़ाई लड़़ी है। जबकि शिष्ट साहित्य ने इसमें हमेशा कोताही की है। भूमण्डलीकरण के चलते भाषाई नस्लवाद पैदा हो रहा है। जिसपर खास ध्यान देने की जरूरत है। जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष प्रो0 राजेन्द्र कुमार ने कहा कि अपने समय के खराब बताने से ही काम नहीं चलेगा। इस समय सही राजनीतिक चेतना की सबसे अधिक जरूरत है। उन्होंने मिथक¨ं की पुनरव्याख्यायित&nbsp; करने से आगाह करते हुए कहा कि कई बार यह उन्हें नया जीवन दे देते हैं। लोक कलाओं की कुछ शैलियों&nbsp; को अपनाकर लोकगीत, नृत्य, नाटकों को जनवादी चेतना से लैस बनाने की जरूरत और जनता के संघर्षों की तरह धारदार सांस्कृतिक आंदोलन पर बल दिया। संगोष्ठी का संचालन समकालीन जनमत के संपादकीय मण्डल के सदस्य के0 के0 पाण्डेय ने किया। इस मौके पर जोगिया के इसराइल सहित कई अन्य लोगों ने अपनी बात कही। जोगिया गांव के विशाल मुक्ताकाशी मंच पर रविवार को लोकरंग के दूसरे दिन बाकुम कवित्त और जोगी गायन ने हजारों की संख्या में जुटे दर्शकों को लुप्त हो रही इस विधा से परिचित कराया तो आजमगढ से आई इप्टा की टीम ने जांघिया और धोबियाऊ नृत्य प्रस्तुत कर लोगों को रोमांचित कर दिया। बाकुम एक ऐसी लोक शैली है जिसमें लोकगायक घर-घर घूमकर अपनी कविता से लोगों का न सिर्फ मनोरंजन करता था बल्कि सामाजिक विडम्बनाओं, विद्रूपताओं पर कठोर प्रहार भी करता था। इस लोक शैली के वाहक अब इक्का-दुक्का ही बचे हैं। इन्ही में से एक कुशीनगर के ईंट भट्ठा मजदूर हरेन्द्र ने बाकुम की प्रस्तुति की। कौडियों से टांके गए काले कपडे पहन कर हरेन्द्र मंच पर आए। उनके एक हाथ में लाठी थी तो दूसरे हाथ में खन-खन की आवाज करने वाला डिब्बा। उन्होंने गांवों में भ्रष्टाचार पर अपनी कविताओं के जरिए करारा प्रहार किया। सारंगी बजाते हुए गांव-गांव घूमकर गोपीचन्द, भर्तहरि के बाबा गोरखनाथ के प्रभाव में राज-पाट छोड़कर सन्यासी हो जाने का आख्यान गाने वाले जोगियों की स्मृति सफाई लाल जोगी और सरदार शाह की प्रस्तुति से ताजा हुई। फरूआही और अहिरऊ से मिलता जुलता लोकनृत्य जांघिया और धोबियाऊ को आजमगढ की इप्टा ने प्रस्तुत किया। इस नृत्य में नर्तकों की पैरों की चपलता देखने लायक थी। आयोजन के दूसरे दिन भी पटना की सांस्कृति संस्था हिरावल के जनगीतों और&nbsp; बलिया की संकल्प संस्था के परम्परागत लोकगीतों ने खूब समां बांधा। कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति हिरावल के नाटक कामधेनु की प्रस्तुति थी। संतोष झा द्वारा निर्देशित इस नाटक में राजनीति के अपराधी करण पर करारा प्रहार किया गया था। लोकरंग सांस्कृतिक समिति के सदस्यों और बाहर से आए कलाकारों को स्मृति चिन्ह देने के साथ पांचवे लोकरंग का समापन हुआ।</p>
<p>मनोज कुमार सिंह</p>
<p>71 एम.आई.जी.. राप्तीनगर, प्रथम चरण गोरखपुर 273003</p>
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		<title>लोक की कविता का उत्सव ‘लोकरंग-2013’</title>
		<link>https://lokrang.in/folk-poetry-festival/561/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:52:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोक गायक और कलाकार, पुरबी के बादशाह स्वर्गीय महेन्दर मिसिर की स्मृति को समर्पित, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा के गाँव जोगिया जनूबी पट्टी (कुशीनगर ) में गत १५-१६ मई को सम्पन्न&#160; लोक-कलाओं का अनूठा रंगारंग समागम छठां लोकरंग-2013 देखते हुए रेणु की कहानियों की वह आत्मीय और रागपूर्ण दुनिया याद आ रही थी, जो जीवन...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लोक गायक और कलाकार, पुरबी के बादशाह स्वर्गीय महेन्दर मिसिर की स्मृति को समर्पित, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा के गाँव जोगिया जनूबी पट्टी (कुशीनगर ) में गत १५-१६ मई को सम्पन्न&nbsp; लोक-कलाओं का अनूठा रंगारंग समागम छठां लोकरंग-2013 देखते हुए रेणु की कहानियों की वह आत्मीय और रागपूर्ण दुनिया याद आ रही थी, जो जीवन को सामूहिकता और अन्तरंगता से जीने से बनी है . लोक-जीवन का वह भरोसा जो खेतों में साथ-साथ काम करने तथा असुविधाओं के बीच एक-दूसरे के दुख साझा करने और सुख बांटने से बनता है, इन लोक-नृत्यों के लोक -कलाकारों की दैहिक भाषा में भी जीवन के प्रति सकारात्मक एवं आशावादी दृष्टिकोण का एक अचेतन सन्देश संप्रेषित करा जाता है . एक संवादी मजाकिया अंदाज और हंसमुखता इन नृत्यों को वह रसमयता प्रदान करता है, जो अलगाव, उदासी और अहंकारी उपेक्षा की नगरीय सांस्कृतिक दृष्टि और उसकी पेशेवर बाजारू संस्कृति से बिलकुल अलग है. लोकरंग में शामिल लोक-नृत्यों को देखते हुए लगा कि प्राकृतिक पर्यावरण की तरह ही विनाश के खतरे के कगार पर पहुँचने के बावजूद लोक-नृत्यों के पास, नगरों की व्यावसायिक सभ्यता को देने के लिए बहुत कुछ अब भी शेष है . उसके पास वह मन, वह चित्त और आत्मा बची हुई है, जो उसके अवसादी चित्त में उल्लास के रंग भर सकता है. लोक के पास जो निरंतर श्रमशील संवादी चित्त है, साहचर्य को शिष्टाचार की तरह जीने वाला&nbsp; जीवनानुभव है&nbsp; तथा एक-दूसरे को जीने का सांस्कृतिक आग्रह है, वह लोक-कलाओं को शास्त्रीयता की दुरुहताओं से मुक्त लोक-धर्म ही बना देता है .</p>
<p><span id="more-561"></span></p>
<p>कुशीनगर के जोगिया जनूबी पट्टी गाँव में बाजारवाद, शहरीकरण और भूमंडलीकरण के वर्तमान&nbsp; उच्छेदक दौर में लगभग विलुप्त होने के कगार पर पहंुच चुकी लोक कलाओं और उसके कलाकारों को जीवित मंच प्रदान करने के लिए आयोजित ‘लोकरंग-2013’ का दो दिवसीय उत्सव-मेला&nbsp; इस अहसास को तीव्रता से जगाने में सफल रहा कि हम वर्तमान में कहाँ हैं और क्या-कुछ खोते जा रहे हैं . इन नृत्यों और गीतों में उन रिश्तों के पद-चिन्ह अब भी&nbsp; देखे जा सकते हैं, जिनकी रिश्तेदारियां सिर्फ मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति तक भी व्याप्त थीं . इन रिश्तों का आरोह-अवरोह ही लोक कलाओं में संवेदना के सम-विषम रंग भरता है . लोक कलाओं की देह-भाषा भी मूल मानवीय संवेदनाओं की समीपवर्ती होती है .उनमें कई पीढि़यों द्वारा परिष्कृत संवेगात्मक प्रतिभा और चरित्र-सर्जना के दर्शन होते हैं .&nbsp;&nbsp;गाँव में सुभाष जी की पारिवारिक भूमि पर सुरुचिपूर्ण ढंग से बनाया गया खुला विस्तृत प्रेक्षागृह और उसमें दूर-दराज से आए ग्राम-वासियों की वैसी ही उन्मुक्त-अकुंठ भागीदारी इस कार्यक्रम को भव्यता और विशिष्टता प्रदान कर रही थी . यह लोक कलाओं का एक भव्य और यादगार मेला था . जैसे बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस युग में लोककलाओं को स्वस्थ और संरक्षित रखने के लिए एक अत्याधुनिक एवं उच्च सुविधाओं वाला चिकित्सा-केंद्र ही खोल रखा है . र्कायक्रम से पूर्व ही गाँव में आकर संभावना कला-मंच, गाजीपुर के चित्रकार राजकुमार सिंह, राजीव कुमार गुप्ता और सपना सिंह ने एक दिन पूर्व भारी संख्या में अपने बनाए भित्ति-चित्रों और चित्रमय कविता-पोस्टरों से कार्यक्रम स्थल को प्रदर्शनी स्थल में परिवर्तित कर दिया था .&nbsp;&nbsp;&nbsp; लोकरंग कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि लोक की कला एवं कविता में बड़ी शक्ति है . सहज, मार्मिक एवं प्रभावशाली अभिव्यक्ति के कारण लोक की कविता विचारों को बदल सकती है . लोकरंग आयोजन से अभिभूत&nbsp; चर्चित कथाकार&nbsp; महेश कटारे ने आयोजन को महत्वपूर्ण बताते हुए स्वयं भी एक लोकगीत का सस्वर गायन किया . उद्घाटन&nbsp; के अवसर पर अपने स्वागत-भाषण में लोकरंग आयोजन-समिति के अध्यक्ष कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने लोकरंग कार्यक्रम को बाजारवाद की आंधी में खो रहे मूल्यों को सहेजने का एक विनम्र प्रयास बताया . उनका कहना था कि लोकरंग सामूहिकता की देन है . ऐसे में सिर्फ लोक-संस्कृतियों का संरक्षण ही ग्रामीण समाज में खत्म हो रही समरसता को वापस ला सकता है . इस दृष्टि से लोक कलाओं को बचाने की मुहिम में लोकरंग एक महत्वपूर्ण प्रयास है इसमें ऐसे कलाकारों को भी मंच देने का प्रयास किया गया है जिन्हें अब तक कोई मंच नहीं मिल सका है . सुभाष जी के इस कथन से सहमत होते हुए उन्हें यह सुझाव देना उचित लगता है कि उनकी समिति ने पिछले छः वर्षाें में लोक-कलाकारों और प्रशंसकों का जो सक्रिय समाज निर्मित किया है, उसे अपनी संस्था के माध्यम से जोगिया जनूबी पट्टी से बाहर भी ले जाने की जरुरत है . उनके-चित्त के हास्य-लास्य को उदास शहरों को भी दिखने की जरुरत है . इन नृत्यों में गांवों की श्रमजीवी सभ्यता का वह सांस्कृतिक अचेतन भी समाया हुआ है जो शब्दों में मुखरित चाहे न हो लेकिन&nbsp; कलात्मक प्रभावों से भी संप्रेषित हो जाती है . इन नृत्यों में बहती हवा में फसल का हिलना, पेड़ों का झूमना महसूस किया जा सकता है तो&nbsp; फिरकी की तरह घूमते नृत्य-परिधानों में बादलों का घुमड़ना भी प्रायः सभी लोक-नृत्यों में स्वांग की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है . स्वांग अभिजात्य वर्ग के अनुकरण के कारण न सिर्फ समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक महत्त्व के प्रतिपाठ प्रस्तुत करते हैं, बल्कि समुदाय-विशेष के नजरिए को भी सामने लाते&nbsp; है . उदाहरण के लिए धोबिया-नृत्य में राजसी परिधानों&nbsp; और कृत्रिम घोड़ों की सहायता से किया जाने वाला&nbsp; स्वांगपूर्ण नृत्य, उच्च वर्ग की भंगिमाओं का अच्छा उपहास करती है .&nbsp; १५ मई को शाम ९ बजे से आरम्भ हुआ कार्यक्रम रात के तीसरे पहर तक चला . लोक-नृत्यों के विविध रंग दूर-दूर से आए कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए . कार्यक्रम का आरम्भ मतिरानी, फूलमती और लीलामती आदि महिलाओं द्वारा प्रस्तुत कुटनी-पिसनी के गीत यानि जंतसार से हुआ . दर्जन चैहान और उनके साथियों का आवेश एवं नाटकीयता के साथ किया गया आल्हा गायन, पटना से आई प्रेरणा ईकाई द्वारा प्रस्तुत जनगीत, हुड़का और धोबिया नृत्य तो&nbsp; सराहनीय और अविस्मरणीय रहे . श्रमजीवी जातियों के पूर्वजों द्वारा विकसित ये नृत्य-शैलियाँ अपनी ऊर्जात्मक प्रस्तुति के लिए भी ध्यान आकर्षित करती हैं . उन्हें देखते हुए मैंने महसूस किया कि वे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाले नृत्य और गायन शैलियाँ हैं . वैसे तो लोक-कलाएँ प्रायः जातीय संस्कृति का ही हिस्सा हैं, प्राचीन काल से ही ये अलग कबीलों और अलग जातियों की सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान से भी जुडी हैं . इनका अलग स्वरूप में होना और अलग प्रकार के वाद्य-यन्त्र का उपयोग करना बताता है कि इनका विकास सामुदायिक अस्मिता के लिए ही किया गया था . इस दृष्टि से यह जाति-प्रथा की पूरक संस्कृति का हिस्सा हैं . आज सामूहिक अस्मिता का दबाव और पिछडी जातियों से संबंधित होने की मानसिकता कुंठा के सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव के कारण उनकी ही जातियों की नयी पीढ़ी को इन लोक-कलाओं से दूर कर रही है .नयी पीढ़ी पिछड़ेपन को विज्ञापित करने वाली सभी सांस्कृतिक पहचानों से मुक्त हो जाना चाहती है . वह अपनी ही परम्पराओं को छोड़कर भाग रही है . ऐसे में इन लोक-कला शैलियों को बचाने के लिए दूसरी जाति के कलाकारों को भी इन्हें सीखकर सामाजिक आदर्श प्रस्तुत करने की जरुरत है . अब समय आ गया है कि इन्हें जातीय पहचान और दायित्वबोध से मुक्त होकर अपनी लोक-संस्कृति की सामूहिक विरासत माना जाए . इस पर शोध हो, इनको लुप्त होने से बचाने के लिए इसके शास्त्र को भी विकसित कर लेने की जरुरत है . इसका शुद्ध रूप शास्त्र निर्मित कर ही बचाया जा सकता है .&nbsp; लोकरंग में प्रस्तुत कई नृत्य आधुनिक या फिल्मी नृत्यों से इसलिए प्रभावित लग रहे थे कि प्रायः सभी युवा कलाकार अपनी वास्तविक जिन्दगी में फिल्मी नृत्य करते रहे हैं . इस प्रभाव से बाहर निकलकर विशुद्ध परंपरागत प्रस्तुति के लिए शोध, सर्वेक्षण और शास्त्र की जरुरत होगी . शास्त्र बन जाने पर इन लोक-नृत्यों को पाठ्îक्रम में शामिल करने के लिए दबाव बनाना भी आसान होगा और संभवतः यही सुभाष चन्द्र कुशवाहा की लोकरंग समिति का भावी लक्ष्य भी है . कार्यक्रम के दूसरे&nbsp; दिन&nbsp; लोक-कलाओं के स्वरूप और संकट पर साहित्यकारों और कलाकारों की मिली-जुली&nbsp; अनौपचारिक गोष्ठी&nbsp; मदन मोहन , चरण सिंह पथिक और अनिल पतंग को मंचस्थ कर आरम्भ हुई. गोष्ठी का आधार-वक्तव्य देते हुए डॉ. तैय्यब हुसैन ने लोक-कलाओं पर पड़ने वाले विभिन्न आधुनिक कुप्रभावों की चर्चा करते हुए लोक कलाओं के जातीय स्वरूप और नई पीढ़ी के उससे कटते जाने के कारणों पर विस्तृत प्रकाश डाला . राजस्थान से आये कहानीकार चरण सिंह पथिक ने राजस्थान के समृद्ध लोक कला विरासत के अनुभव के आधार पर बीती रात के लोक-नृत्यों की समीक्षा की .उन्होंने भोजपुरी अंचल के लोक-नृत्यों को और लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया .&nbsp;&nbsp;अभी-अभी केदार सम्मान से सम्मानित कवि दिनेश कुशवाह ने लोक-कला की तुलना शास्त्रीय कला से करते हुए लोक कलाओं को अधिक समृद्ध और मानवीय बताया . उनका कहना था कि लोक कलाएँ अपनी स्वच्छंद अभिव्यक्ति के कारण जीवन के अधिक नजदीक होती हैं . जबकि शास्त्रीय कलाएँ जीवन से दूर खाए-पीए-अघाए लोगों की कला है&nbsp; .दिनेश का कहना था कि यह समय भूमंडलीकरण का है . हमें प्रतिरोध के लिए अपनी जड़ों से भी जुड़़ना होगा . लोकरंग जैसे आयोजन ही हमें अपनी जड़ों की ओर खींचने में कारगर होंगे . उन्होंने गाँव छोड़कर शहरों की ओर जन-पलायन को भी लोक-चित्त के लुप्त होने का कारण बताया&nbsp; . &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने लोक-प्रथाओं&nbsp; और लोक-कला के बीच के रिश्तों पर प्रकाश डालते हुए कहा की गांवों की स्त्रियाँ जब भेंटती थीं तो गाने में रोना और रोने में गाना के साथ दुःख-दर्द -संवाद की&nbsp; कई अन्य भूमिकाओं में भी होती थीं . बेगुसराय से आए रंग-अभियान पत्रिका के संपादक अनिल पतंग ने लोक कलाओं के प्रति बढ़ती उपेक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए उसके संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयासों को अपर्याप्त बताया . कथाकार मदन मोहन ने कलाकारों की सक्रिय टोलियाँ और समूह बनाकर लोक कलाओं को बचाने की जरुरत पर बल दिया . डॉ. मुन्ना तिवारी ने शास्त्रीय नृत्य और लोक-नृत्य की भंगिमा और अभिव्यक्ति-शैली का अंतर स्पष्ट करने वाला अत्यंत रोचक और नाटकीय वक्तव्य दिया . कथादेश के संपादक हरिनारायण ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मूल्यों की , लोक मूल्यों की बात&nbsp; केवल साहित्य कर सकता है लेकिन आज सामाजिक मूल्यों के लोप की स्थिति है . साहित्य लोक को छोड़कर सिमटता जा रहा है&nbsp; . इस अलगाव के लिए पढ़ा-लिखा वर्ग भी जिम्मेदार है . लोक गीत और कलाएँ इसी खालीपन या रिक्तता को भरती हैं .&nbsp;&nbsp; दो दिवसीय इस र्कायक्रम में&nbsp; कई इकाईयों ने अपनी-अपनी प्रभावशाली नाट्य-प्रस्तुतियां दीं . कई समूहों का गायन भी अत्यंत प्रभावशाली रहा . विविध लोकगीतों, नृत्यों के अलावा लोकरंग 2013 में&nbsp; हसन इमाम&nbsp; के निर्देशन में प्रेरणा, जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, पटना द्वारा नाटक- पोलटिस उर्फ मुक्तनाद प्रस्तुत किया गया . दूसरी रात, हिन्दू-मुस्लिम एकत्व की पुरानी धरोहर संस्कृति ‘पंवरिया नृत्य’ और उसकी सोहर एवं पंवारा गायकी ने विभाजनकारी ताकतों को नकारने को विवश किया . गुड़ी, रायपुर, कला और नाटक को समर्पित सामाजिक, सांस्कृतिक संस्था द्वारा नाटक-उजबक राजा तीन डकैत (हैंस क्रिश्चियन एंडरसन की कथा-द एम्परर्स न्यू क्लाथ्स पर आधारित) जैसा शानदार नाटक प्रस्तुत किया गया . इस नाटक ने वैश्विक पूंजी के सहारे औपनिवेशिक सत्ता स्थापित करने के कुचक्र को दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर मंत्रमुग्ध कर दिया .&nbsp; इस नाटक का निर्देशन&nbsp; योगेन्द्र चैबे ने किया था . अभिषेक पंडित के निर्देशन में&nbsp; सूत्रधार, आजमगढ़ द्वारा रविन्द्र नाथ ठाकुर रचित गूंगी नाटक को विदेशिया शैली में प्रस्तुत किया गया और खराब मौसम के बावजूद दर्शकों को दो बजे रात्रि तक बांधे रखा .&nbsp; लोकरंग कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों और स्थानीय पत्रकारों के साथ&nbsp; रंगकर्मियों और नयी पीढ़ी के लोक कलाकारों की बड़ी संख्या में उत्साहपूर्ण भागीदारी,&nbsp; लोकरंग समिति के माध्यम से ही सही, लोक कला के सुरक्षित भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है . दो दिवसीय इस लोकरंग में&nbsp; प्रो.&nbsp; वीरेन्द्र नारायण यादव, प्रो. अनिल राय, जितेन्द्र भारती सहित भारी संख्या में स्थानीय साहित्यकार और शिक्षाविद् मौजूद रहे .</p>
<p>प्रस्तुति- रामप्रकाश कुशवाहा</p>
<p>विभागाध्यक्ष, हिन्दी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, युसुफपुर, मोहम्मदाबाद, गाजीपुर . एवं बी-१, श्री साईं अपार्टमेंट, टडिया (करौंदी ) सुन्दरपुर, वाराणसी -२२१००५</p>
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		<title>जोगिया से बहती ‘लोकरंग’ की बयार &#8211; लोकरंग 2011</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:50:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जोगिया से बहती ‘लोकरंग’ की बयार कुशीनगर के जोगिया गांव में लगातार चैथी बार लोकरंग का आयोजन 26 और 27 अप्रैल को संपन्न हुआ। इस बार का आयोजन, विगत के आयोजनों से ज्यादा व्यवस्थित, भव्य और विविधता लिये हुये था। इस बार की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि कार्यक्रमों की प्रस्तुति के लिए कथाकार सुभाष...</p>
<p>The post <a href="https://lokrang.in/the-wind-of-lokrang-flows-from-jogia/559/">जोगिया से बहती ‘लोकरंग’ की बयार &#8211; लोकरंग 2011</a> appeared first on <a href="https://lokrang.in">लोकरंग</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जोगिया से बहती ‘लोकरंग’ की बयार<br />
कुशीनगर के जोगिया गांव में लगातार चैथी बार लोकरंग का आयोजन 26 और 27 अप्रैल को संपन्न हुआ। इस बार का आयोजन, विगत के आयोजनों से ज्यादा व्यवस्थित, भव्य और विविधता लिये हुये था। इस बार की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि कार्यक्रमों की प्रस्तुति के लिए कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा की अगुवाई वाली आयोजक संस्था -‘लोकरंग सांस्कृतिक समिति’ ने एक एकड़ जमीन में एक विशाल परिसर और उसमें एक विशाल मुक्ताकाशी मंच का निर्माण करा दिया था। इससे लोक कलाकारों को अपने कार्यक्रम के मंचन और दर्शकों को कार्यक्रम का पूरा आनंद लेने का मौका मिला। गांव पधारने वाले कलाकारों और साहित्यकारों का गांव वालों ने टीका लगाकर और गाजे-बाजे के साथ भव्य स्वागत किया ।<br />
पूर्वी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण कवि रामधार त्रिपाठी‘जीवन’ की याद में समर्पित लोकरंग का उद्घाटन जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रख्यात आलोचक प्रो0 मैनेजर पांडेय ने किया। इस मौके पर उन्होंने ‘लोकरंग-2’ पुस्तक और ‘लोकरंग 2011’ स्मारिका का विमोचन भी किया। उद्घाटन के मौके पर उन्होंने कहा कि लोक कलाओं में समाज को जोड़ने की शक्ति होती है। जैसे कि विद्यापति मैथली के कवि हैं लेकिन देश के हर हिस्से में सुने और समझे जाते हैं। इसी प्रकार मीराबाई राजस्थान से लेकर मिथिला की कवि हैं। प्रो0 पांडेय ने लोक कलाओं की तीन खास विशेषताओं-शक्ति, गति और वातावरण को अपने में समेटने की क्षमता का जिक्र करते हुए कहा कि आज लोक कला और लोक संस्कृति पर सबसे अधिक खतरा बाजार का है। वह इसे निगल जाना चाहता है। लोकरंग जैसे कार्यक्रम लोक कलाओं को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।<br />
प्रो0 पांडेय के उद्घाटन वक्तव्य के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत गांव की लड़कियों द्वारा प्रस्तुत सोहर और कजरी से हुई। इसके बाद पोखर भिंडा मटिहिनिया गांव से आए चिंतामणि प्रजापति और उनके साथियों ने खजड़ी वादन के साथ निर्गुन प्रस्तुत किया। पहले दिन के कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण पटना के निर्माण कला मंच की नाट्य प्रस्तुति बिदेसिया रही। संगीत प्रधान लोक नाटकों की देश और विदेश में सैकड़ों प्रस्तुतियां कर चुकी इस संस्था ने भिखारी ठाकुर के तमाशा बिदेसिया को जोगिया में जीवंत कर दिया। संजय उपाध्याय द्वारा निर्देशित इस नाट्य प्रस्तुति में काम की तलाश में कलकत्ता जाने वाले युवा मजदूर की पत्नी की वेदना, दुख, पीड़ा बड़ी शिद्दत से व्यक्त हुई। इस नाट्य संस्था ने लोकरंग की दूसरी शाम को हरसिंगार नाटक का मंचन किया। यह नाटक पारम्परिक लोक नाट्य डोमकथ के हरबिसन दम्पति की कहनी के जरिए स्त्री-पुरूष सम्बन्धों की जटिलताओं को सामने लाता है। दोनों ही नाटकों में निर्माण कला मंच के कलाकारों ने अपने अभिनय से ग्रामीण दर्शकों को सम्मोहित सा कर लिया।<br />
दो दिवसीय कार्यक्रम में चन्द्रभान सिंह यादव और उनके साथियों ने महोबा शैली का आल्हा गायन प्रस्तुत किया तो फैजाबाद से अवधी लोक समूह ने फरुआही पेश की। आल्हा गायन की बुंदेलखंड में मुख्यतः चार शैलियां-महोबा, करगवां, दतिया और सागर गायन प्रचलित हैं। ढोलक और मंजीरें के थाप पर चन्द्रभान सिंह ने ओजस्वी स्वर में आल्हा, उदल द्वारा अपने पिता के हत्या का बदला लिए जाने की लोककथा सुना कर लोगों को रोमांचित कर दिया। अवधी लोक समूह द्वारा प्रस्तुत फरुआही एकदम नई शैली का था और इस समूह ने परम्परागत फरुआही नृत्य व गीत में कई प्रयोग किए थे। नृत्य के दौरान कलाकरों ने हैरतअंगेज करतब दिखाए। नए वाद्य यंत्रों और नृत्य की नई भंगिमाओं ने लोगों का मन मोह लिया। बुन्देली कछवाहा समाज का अवधूती शब्दों का गायन सुनना एक नए अनुभव से गुजरना था। ढपली, किकहरी जैसे वाद्य यंत्रों द्वारा दाता साईं की अराधना कछवाही समाज सदियों से करता आया है । दाता साईं के शब्द बहुत ही गूढ हैं और इस संगीत व साहित्य परम्परा पर ज्यादा काम नहीं हुआ है। लोकरंग में मंगल मास्टर और अंटू तिवारी ने भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति की। लोकरंग में आए सभी कलाकारों को आयोजन समिति द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।<br />
लोकरंग के दूसरे दिन दोपहर में ‘लोकसंस्कृति में मिथ की प्रासंगिकता’ पर विचारोत्तेजक संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात आलोचक प्रो0 मैनेजर पांडेय ने कहा कि मिथकों की बात करते समय लोक गाथा, लोकरीति, लोकविश्वास, लोकरूढि को अलग-अलग रख कर विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कथा स्वभाव से ही मिथकीय है, इसलिए कथा में सर्वाधिक मिथक गढ़े गए। प्रो पांडेय ने कहा कि सत्ता, लोक, धन, सम्पदा का ही अपहरण नहीं करता बल्कि कला और दिमाग पर भी कब्जा करने की कोशिश करता है। इसलिए मिथकों पर कब्जा करने की राजनीति पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सत्ता ने लोकसंस्कृति और मिथकों की पहले उपेक्षा की, फिर विरोध किया और उससे भी काम नहीं चला तो विकृत करने का प्रयास किया। उन्होंने पौराणिक एवं ऐतिहासिक मिथकों की चर्चा करते हुए कहा कि मिथकों को पवित्र मानकर उस पर जल चढाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने इतिहास से मिथकों के गहरे रिश्ते को समझने पर जोर दिया।<br />
इसके पूर्व वरिष्ठ लेखक डा0 तैयब हुसैन ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि लोक संस्कृति में सब कुछ ठीक नहीं है। इसमें से अपने हित की बात को लेना होगा। उन्होंने मिथक की तुलन उस चाकू की तरह की जो डाक्टर के हाथ में होने पर जान बचाने के काम आता है और हत्यारें के पास होने पर जान लेने के। युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने अपसंस्कृति और जनसंस्कृति के बीच निरन्तर टकराव की बात करते हुए कहा कि मिथकों का सबसे अधिक निर्माण दलित साहित्य ने किया है। उन्होंने लोकसंस्कृति की संशलिष्टता को राजनीति की तरह ढालने के प्रयास का विरोध किया। वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि मिथकों का इस्तेमाल सधे ढंग से करना होगा। कवि एवं रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष दिनेश कुशवाह ने कहा कि मिथक लोक साहित्य में ऐसे रचे-बसे होते हैं कि सत्य से अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं। उन्होंने इस बात से असहमति जताई कि मिथकों का कोई वैज्ञानिक आधार है। हाजीपुर से आए डा0 प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन ने कहा कि विज्ञान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, मिथक हमारे जीवन को संजीवनी देते रहेंगे। गलत या विकृत मिथक खोटे सिक्कों की तरह नहीं चलते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चैधरी ने संगोष्ठी में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि समाज को मिथकों के जंजाल से निकालकर ठोस यथार्थ पर खड़ा करने की जरूरत है। उन्होंने पूरे बहस को यह कह कर एक नई दिशा दे दी कि आखिर यह कथन एक मिथक ही तो है कि पूंजीवाद समाप्त नहीं हो सकता । यह मिथक तो आधुनिक सत्ताओं द्वारा सचेतन पर गढ़े गए हैं जिनको तोड़ना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। मिथ के समाज शास्त्र पर उल्लेखनीय काम करने वाले डा0 गोरेलाल चंदेल ने कहा कि पौराणिक मिथ ज्यों का त्यों लोक मिथक में नहीं आता है। लोकसंस्कृति में मिथ लोक को उर्जा एवं शक्ति देता है। जो लोक के लिए उपयोगी है वही लोकसंस्कृति में बना रहता है। छत्तीसगढ़ी गौरा उत्सव के कई सन्दर्भों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास, मिथ और समाज शास्त्र का निरन्तर द्वंद रहता है और इसके भीतर से मिथ का लोकव्यापीकरण होता है।<br />
गोष्ठी का संचालन कवि एवं जनसंस्कृति मंच लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि जनसंस्कृति श्रम और संघर्ष की संस्कृति है। ईश्वरीय सत्ता को स्थापित करने वालों ने मिथकों का जाल बुना है लेकिन इसके बरक्स जनता ने अपने मिथक रचे और गढे़ हैं। संगोष्ठी में डा दुखी शुक्ल, सुधांशु कुमार चक्रवर्ती ने भी अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष एवं कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने किया।</p>
<p>मनोज कुमार सिंह<br />
एम0आई0जी0-71राप्तीनगर,फेज-1, गोरखपुर- 273003</p>
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		<title>लोकरंग- 2010 : पधारो म्हारो जोगिया रे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:37:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कुशीनगर जिले के जोगिया गांव में लोकरंग के तीसरे संस्करण में आठ और नौ मई को लोक कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों की एक बार फिर जुटान हुई। लोक कलाकारों और साहित्यकारों के लिए जोगिया एक बार फिर सजा धजा था। रंग-बिरंगे झण्डों, पतंगों, गुब्बारों और कविता-गीत के पोस्टरों के साथ। नाट्य मंचन में असुविधा को देखते...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;">कुशीनगर जिले के जोगिया गांव में लोकरंग के तीसरे संस्करण में आठ और नौ मई को लोक कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों की एक बार फिर जुटान हुई। लोक कलाकारों और साहित्यकारों के लिए जोगिया एक बार फिर सजा धजा था। रंग-बिरंगे झण्डों, पतंगों, गुब्बारों और कविता-गीत के पोस्टरों के साथ। नाट्य मंचन में असुविधा को देखते हुए इस पर गांव के लोगों ने पक्का चबूतरा बना दिया था। इस चबूतरें पर 20 गुणे 12 फीट का भव्य बैकड्राप कार्यक्रम में चार चांद लगा रहा था । कार्यक्रम में भाग लेने बुन्देलखण्ड से डॉ0 रामभजन सिंह, पटना से तनवीर अख्तर की इप्टा टीम और छत्तीसगढ, रायगढ़ से डॉ0 योगेन्द्र चौबे की गुड़ी टीम तो पहुंची ही थीं साथ ही देश के तमाम लेखक,कवि, कथाकार, रंगकर्मी भी पधारे थे । सभी का कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा की अगुवाई में गांव के युवाओं और ग्रामीणों ने टिका लगाकर तुरही की तुरर-तुरर के बीच स्वागत किया। रात्रि में कार्यक्रम स्थल पर पिछले दो कार्यक्रमों के मुकाबले ज्यादा भीड़ जुटी थी। लोग कार्यक्रम शुरू होने का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे।</div>
<div>&nbsp;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>महाश्वेता देवी जी के सन्देश से हुआ उद्घाटन<br />
</strong>लोकरंग-2010 का उद्घाटन सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के सन्देश से हुआ। वह कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं और उन्हें ही उद्घाटन करना था लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण नहीं आ पाई थीं। उन्होंने लोकरंग कार्यक्रम के लिए भेजे लिखित सन्देश में कहा है कि वह लोकरंग में न आ पाने के कारण हृदय से दुखी है। स्वास्थ्य ठीक नहीं हैं और पश्चिम बंगाल में जारी संकट के कारण उन्हें बहुत काम करना पड़ रहा है। इस स्थिति में क्या करूं&nbsp;? मै लोकरंग कार्यक्रम से बहुत नजदीक से जुड़ाव महसूस करती हूं। उन्होंने पत्र में लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा को इस आयोजन के लिए बधाई देते हुए आयोजन की रिपोर्ट भेजने को कहा है। महाश्वेता देवी का सन्देश आलोचक एवं पत्रकार अनिल सिन्हा ने पढ़ा।</div>
<div>&nbsp;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>लोकरंग स्मारिका का लोकार्पण<br />
</strong>लोकरंग के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति, आलोचक वीरेन्द्र यादव और नाटककार हृषिकेश सुलभ ने स्मारिका लोकरंग-2010 का लोकार्पण किया। स्मारिका में सोहनी-रोपनी के गीत, मोहर्रम गीत, झारी गीत, होरी गीत, जन्तसार गीत सहित कई गीत संकलित किए गए है। इसके अलावा कई महत्वपूर्ण लेख हैं।</div>
<div>&nbsp;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>अंजन जी और रामपति रसिया का सम्मान<br />
</strong>स्मारिका के लोकार्पण के बाद भोजपुरी क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण लोक गीतकारों, राधा मोहन चौबे उर्फ अंजन जी और नथुनी प्रसाद कुशवाहा उर्फ रामपति रसिया को सम्मानित किया गया। अंजन जी बिहार के गोपालगंज जिले के शाहपुर डिघवा गांव के रहने वाले हैं और उन्होंने सैकड़ों लोकगीत लिखे हैं जो उनकी कजरौटा, फुहार, संझवत, पनका, सनेश आदि किताबों में संकलित हैं। रामपति रसिया कुशीनगर जिले के मोरवन गांव के रहने वाले हैं। उन्हें 50 से अधिक निर्गुण लिखे हैं जो उनकी पुस्तक अंजोरिया में बदरी में संकलित हैं।</div>
<div>&nbsp;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>और बजा नक्कारा</strong><br />
उद्घाटन सत्र के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए। कार्यक्रम की शुरूआत जोगिया गांव की किशोरियों द्वारा छठ गीत व रोपनी गीत से हुआ। इसके बाद दिल्ली से आए कवि रमाशंकर विद्रोही ने काव्य पाठ किया। खास तेवर की कविताओं और उनके पाठ करने के अन्दाज पर साहित्यकारों के साथ-साथ ग्रामीणों ने भी ताली बजाई। गोपालगंज बिहार से आए मोहन गौड़ और उनके साथियों ने फरी नृत्य प्रस्तुत किया। इसमें पहले कलाकारों ने नक्कारे की आवाज पर नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने बिरहा पर नृत्य किया। अन्तिम भाग में नक्कारे की आवाज के साथ ताल मिलाकर पलटी मारने, गोता लगाने जैसे करतब प्रस्तुत किए गए। बुन्देलखण्ड से आए लोक कलाकारों ने अचरी, बृजवासी और ईसुरी फाग गायन प्रस्तुत किया। अचरी नवरात्रि में रात्रि जागरण में गाया जाने वाला गीत है तो बृजवासी खेतों की कटाई के समय स्त्री और पुरूष मजदूरों द्वारा मिल कर गाने वाला गायन है। फाल्गुनी बयार के शुरू होते ही बुन्देलखण्ड में होली गीत शुरू होते हैं और फाग गायन के पितामह ईशुरी के फाग गाए जाने लगते हैं। बुन्देलखण्डी लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से बुन्देलखण्डी लोक संस्कृति की झलक दिखाई। छत्तीसगढ़ से आए गुडी संस्था के कलाकारों ने छत्तीसगढ़ी लोक गीत गाए।<br />
नौ मई के रात के कार्यक्रम की शुरूआत उपेन्द्र चतुर्वेदी और उनकी टीम के भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद जितई प्रसाद और उनकी टीम ने हुड़का नृत्य प्रस्तुत किया। हुड़का नृत्य प्रस्तुत करने वाली यह टीम महराजगंज जिले के परसौनी बुजुर्ग गांव से आई थी। हुड़का नृत्य के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक और मशहूर लोकनृत्य पखावज को चिखुरी, सुखराज, शोभी प्रसाद और उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। दोनों ही नृत्य अब बहुत कम देखने को मिलते हैं। कार्यक्रम में फाजिलनगर के संगीत अध्यापक मंगल मास्टर ने दो भोजपुरी गीतों को प्रस्तुत किया। जब उन्होंने अंजन जी का गीत चिन्ता की अगनी तोहके लेस लेस खा जइहें ए मैना तू असरा छोड़ तोता अब ना अइहें और ऐतना से काम न चली न कटी विपतिया, रोई-रोई पतिया लिखवाए रजमतिया सुनाई। कुशीनगर जिले के कप्तानंगज से आए कौव्वाल असगर अली और उनके साथियों ने अमीर खुसरो की रचना छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के, अनवर फर्रूखाबादी की रचना बस तुम्हारे करीब आने से, दुश्मनी हो गई जमाने से और दानिश जौनपुरी की रचना पत्थर की इबादत से तुझे कुछ नहीं मिलेगा, दिल में मेरी तस्वीर सजा क्यूं नहीं लेते सुनाकर लोगों की वाहवाही पाई।</div>
<div>&nbsp;</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>बाबा पाखण्डी और गबरघिचोरन के माई<br />
</strong>लोकरंग में दो नाटकों का मंचन हुआ। आठ मई की रात छत्तीसगढ़ की गुडी संस्था के कलाकारों ने बाबा पाखण्डी नाटक का मंचन किया। छत्तीसगढ़ी लोक कथा पर आधारित यह नाटक एक ऐसे चरित्र के ईद-गिर्द घूमता है जो भविष्यवाणियां करता है और खुद को बाबा के रूप में प्रस्तुत कर लोगों को मूर्ख बनाता है। नाटक में वैश्वीकरण के बाजार में पाखण्ड और अन्धविश्वासों के सहारे पाखण्डियों की पनप रही जमात पर करारा प्रहार किया गया है। नाटक का निर्देशन डॉ0 योगेन्द्र ने किया।<br />
पटना से आई इप्टा की टीम ने भिखारी ठाकुर के दो नाटकों को मिलाकर बनाए गए नाटक गबरघिचोरन के माई की जानदार प्रस्तुति से लोगों का दिल जीत लिया। इस नाटक में स्त्री पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर के निर्देशन में मंचित इस नाटक में युवक गलीच अपनी ब्याहता को छोड़ कलकत्ता चला जाता है और 15 वर्ष तक कोई खोज-खबर नहीं लेता है। इस बीच उसकी पत्नी बच्चे को जन्म देती है। जब गलीज लौटकर आता है तो किशोर हो चुके अपने बेटे को कलकत्ता ले जाने की कोशिश करता है लेकिन उसकी पत्नी उसका विरोध करती है। गबरघिचोर भी मां को छोड़कर परदेश जाने से मना करता है। तभी गांव का एक दूसरा व्यक्ति गड़बड़ी गबरघिचोर को अपना बेटा बताता है। इसको लेकर पंचायत होती है और पंच बने भिखारी ठाकुर गबरघिचोर पर मां का हक बताते हुए उसके पक्ष में फैसला देते हैं।<br />
लोकगीतों को नई धार, विचार से लैस करने की जरूरत<br />
लोकरंग के दूसरे दिन लोकगीतों की प्रासंगिकता पर संगोष्ठी आयोजित की गई । संगोष्ठी में साहित्यकारों ने लोकगीतों और लोकसंस्कृति पर बाजार, अपसंस्कृति और सत्ता के हमले पर चिन्ता जाहिर करते हुए इसको बचाने और नई धार, विचार से लैस करने के लिए आन्दोलन की जरूरत पर बल दिया।<br />
गोष्ठी में शिरकत करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि लोक का तन्त्र में अधिग्रहण हो गया है। लोकगीत जिन परिस्थितियों में रचे जाते हैं उन स्थितियों का अभी लोप नहीं हुआ है। स्त्रियों, दलितों की पीड़ा अभी भी है। लोकसंस्कृति जिस जमीन पर पनपते थे वह अभी कायम हैं लेकिन उसके कार्य में परिवर्तन जरूर हुआ है। आज गांव बदले हैं, जीवन शैली बदली है लेकिन मूल संवेदना बरकरार है। इस मूल संवेदना को आन्दोलनात्मक तेवर देने की जरूरत है। कवि दिनेश कुशवाह ने कहा कि शुद्र और स्त्रियों ने 75 प्रतिशत लोकगीतों की रचना की है। उन्होंने कई लोकगीतों को लय में गाते हुए लोकमानस से निकले स्रोत को भदेस कह कर खारिज करने वाले अभिजात्य वर्ग की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भाषाएं और बोली क्षतिग्रस्त हो रही हैं जिसे बचाने की लिए काम करने की जरूरत है। साहित्यकार अरूणेश नीरन ने कहा कि लोकगीत अध्ययन करने की चीज नहीं बल्कि इसे जिया जाता है। उन्होंने लोक को पाश्चात्य फोक से अलग कर विवेचन करने की जरूरत पर बल दिया। कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि लोकगीतों की प्रासंगिकता पर प्रश्न नहीं हैं बल्कि उस पर आ रहे खतरों को पहचानने और उसका मुकाबला करने की जरूरत है। रंगकर्मी राजेश कुमार ने लोकगीतों और लोकनाट्य रूपों की घार के कुन्द होते जाने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए इसे सत्ता तन्त्र की गहरी साजिश बताया। पटना से आए लेखक तैयब हुसैन ने कहा कि वैश्वीकरण भाषाई नस्लवाद ला रहा है जो लोकगीतों की उपेक्षा का कारण है। नाटककार हृषिकेश सुलभ ने कहा कि जीवन का यथार्थ बदल रहा है जो लोक संवेदना को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि हमें गांव में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक भूख की चिन्ता करनी होगी। कथाकार देवेन्द्र ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जिस तरह आर्थिक संरचना बदल रही है, उसमें सामुदायिक जीवन का ह्रास हो रहा है उसमें सामुदायिकता से उपजे गीत शायद ही बचें।<br />
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे आलोचक एवं पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि लोक गीत हमारे जीवन का मूल रहा है। लोकगीत यथार्थ से उपजी अभिव्यक्ति हैं इसलिए वे नष्ट नहीं होंगे लेकिन उनके उपर बाजारवाद, फूहड़ता, सांस्कृतिक दरिद्रता का खतरा है। गोष्ठी में डॉ0 योगेन्द्र चौबे, रामभजन सिंह, सत्यदेव त्रिपाठी ने भी हिस्सा लिया। संचालन सुधीर सुमन व धन्यवाद ज्ञापन `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने किया।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>लोकरंग में भाग लेने वाले कलाकारों और आयोजन को सफल बनाने वाले श्री मंजूर अली, विष्णुदेव राय, भुवनेश्वर राय, संजय कुशवाहा, इसरायल अंसारी, मुंशरीम, हदीश अंसारी, सुरेन्द्र शर्मा को लोकरंग सांस्कृतिक समिति की ओर से स्मृति चिन्ह प्रदान करने के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ। लोकरंग के पहले और दूसरे सत्र का संचालन सुधीर सुमन ने और तीसरे सत्र का संचालन दिनेश कुशवाह ने किया।</p>
<p>मनोज कुमार सिंह<br />
एम0आइ0जी0-71,राप्तीनगर,फेज-1,गोरखपुर 273003</p>
</div>
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		<title>&#8220;सांस्कृतिक फूहड़पन और भड़ैंती के विरूद्ध&#8221; (लोकरंग 2009)</title>
		<link>https://lokrang.in/against-cultural-sloppiness-and-misogyny/554/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:32:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8220;सांस्कृतिक फूहड़पन और भड़ैंती के विरूद्ध&#8221; लोककला का उत्सव और उत्सव का गांव के रूप में चर्चित जोगिया जनूबी पट्टी,आजकल चर्चा में है । यह गांव गौतम बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर से लगभग 17 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक छोटा सा कस्बा,फाजिलनगर से तीन किलोमीटर दूर है । राष्ट्रीयकृत मार्ग से एक...</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4>&#8220;सांस्कृतिक फूहड़पन और भड़ैंती के विरूद्ध&#8221;</h4>
<p>लोककला का उत्सव और उत्सव का गांव के रूप में चर्चित जोगिया जनूबी पट्टी,आजकल चर्चा में है । यह गांव गौतम बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर से लगभग 17 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक छोटा सा कस्बा,फाजिलनगर से तीन किलोमीटर दूर है । राष्ट्रीयकृत मार्ग से एक ऊबड़-खाबड़, पगडण्डीनुमा सड़क जोगिया जनूबा पट्टी को जाती है । जोगिया जनूबी पट्टी हिन्दी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा का पैतृक गांव है। उनके संयोजन में `लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने एक नई सांस्कृतिक पहल ली गयी है ।</p>
<p><span id="more-554"></span><br />
गांव के युवाओं को अपसंस्कृति और फूहड़नप से बचाने, खत्म हो रही समरसता,सामाजिकता और भाईचारा को नव जीवन प्रदान करने के लिए, लोक कलाओं को मंच प्रदान कर इस संस्था ने पूरे गांव को कला गांव के रूप में बदल डाला है । दीवारों व अनाज के बखारों पर बनी सुन्दर कलाकृतियां, जगह-जगह भोजपुरी व हिन्दी कविताओं, गीतों के पोस्टरों ने गांव को आर्ट गैलरी की शक्ल दे दी है । गांव और देश के तमाम साहित्यकार, कलाप्रेमी चकित मन से यहां खींचे चले आ रहे हैं ।&nbsp;वर्ष 2008 में यह आयोजन 23 व 24 मई&nbsp;को संपन्न हुआ था और&nbsp;वर्ष 2009 में 28 व 29 मई को `लोक रंग-2009´ के दो दिवसीय कार्यक्रम में सौ से अधिक क्षेत्रीय लोक कलाकारों के साथ बड़ी संख्या में हिन्दी के जाने-माने लेखक व बुद्धिजीवी आये। दो दिनों तक चले इस कार्यक्रम में विविध लोक कलाओं, जनगीतों व नाटकों का प्रदर्शन हुआ तथा `विकास की आन्हीं : उड़ गइल छान्हीं´ विषय पर संगोष्ठी हुई। इस आयोजन के द्वारा यह विचार मजबूती के साथ उभरा कि लोक संस्कृति की जन पक्षधर धारा को आगे बढ़ाकर ही अपसंस्कृति का मुकाबला किया जा सकता है।</p>
<p>`लोक-रंग´ के इस आयोजन को देखने-सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग आये। उन्होंने फूहड़ पुरबिया गानों की जगह अपनी मिट्टी, जीवन के गीत.संगीत तथा अपनी लोक कलाओं का भरपूर आनन्द उठाया। इस आयोजन की एक बड़ी खासियत थी कि यह बिना किसी सरकारी मदद के संपन्न हुआ और पूरी तरह जनता के सहयोग व भागीदारी पर निर्भर था। जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ तथा प्रगतिशील लेखक संघ जैसे सांस्कृतिक संगठनों का इसे सहयोग मिला। हिरावल, पटना तथा इप्टा, आजमगढ़ तो अपने पूरे दल-बल के साथ यहां मौजूद रहे ही। इस तरह `लोक-रंग-2009´ लोक कलाकारों के मिलन का मंच भी बना।</p>
<p>वर्ष 2009 का आयोजन भोजपुरी के लोकप्रिय कवि मोती बी0ए0 और लोक कलाकार मो0 रसूल को समर्पित था। इस मायने में `लोक-रंग´ की यह उपलब्धि कही जायेगी कि उसने गुमनाम लोक कलाकार रसूल की खोज की है जिनकी मृत्यु 1952 में हो चुकी है । बिहार के गोपालगंज के गांव जिगना के रहने वाले रसूल का नाम कभी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बंगाल तक मशहूर था। वे हिन्दू,मुस्लिम की साझी पुरबिया संस्कृति की अनूठी मिसाल थे। अपने लिखे भजनों, गीतों व नाटकों के द्वारा वे काफी लोकप्रिय रहे । उन्होंने आजादी की लड़ाई में योगदान दिया था और अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध आवज उठाई थी &#8211;<br />
`छोड़ द गोरकी के अब तू खुशामी बालमा<br />
एकर कहिया ले करब, गुलामी बालमा ।´</p>
<p>रसूल की खोज करते हुए संस्था ने 350 पृष्ठों की लोक संस्कृति की अनूठी पुस्तक `लोकरंग-1´, प्रकाशित किया है जिसके संपादक, सुभाष चन्द्र कुशवाहा हैं ।</p>
<p>दो दिनों तक चले इस समारोह में श्रीमती शान्ती के नेतृत्व में गांव की महिलाओं के द्वारा कजरी गायन, रामजीत सिंह और उनके साथियों के द्वारा एकतारा वादन व निर्गुन गायकी, नागेश्वर यादव और उनके साथियों के द्वारा बिरहा गायकी व फरी नृत्य, मीर बिहार व कटहरी बाग की टीमों के द्वारा चइता गायन, देसही देवरिया की टीम के द्वारा खजड़ी, एकतारा वादन व निर्गुन गायकी, आदि विविध कार्यक्रमों के द्वारा लोक संस्कृति का प्रदर्शन हुआ। इप्टा, आजमगढ़ ने लोकगीतों के अलावा कहरवा , जांघिया नृत्य, धोबियाऊ नृत्य और जोगीरा प्रस्तुत किया।</p>
<p>हिरावल ने भारतेन्दु हरिश्चन्द के प्रसिद्ध नाटक `अंधेर नगरी चौपट राजा´ का मंचन किया। इसके मूल नाट्या लेख में परिवर्तन किए बिना देश के अन्दर बढ़ती साम्प्रदायिकता, बाजारवाद के विभिन्न दृश्यों के समायोजन के द्वारा हिरावल ने इस नाटक को सामयिक बनाने का प्रयास किया है। सूत्रधार, आजमगढ़ ने इस मौके पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के द्वारा लिखित नाटक `हवालात´ का मंचन किया। हिरावल के द्वारा वीरेन डंगवाल, महेश्वर, गोरख पाण्डेय, दिनेश कुमार शुक्ल, प्रकाश उदय आदि की कविताओं व गीतों की प्रस्तुति इस आयोजन का विशेष आकर्षण था।</p>
<p>पूर्वांचल में गायन, वादन, नृत्य आदि के जो कला रूप आम तौर पर प्रचलित व लोकप्रिय हैं, `लोक-रंग´ में उनकी एक बानगी देखने को मिलती है। वैसे ये विधाएं आज संकट में हैं और धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। लेकिन इस समारोह से इन विधाओं को फिर से अपनी जमीन मिल रही है। कलाकारों में अच्छा-खासा उत्साह है। वे अपनी कला को मांजने तथा नयी विषय-वस्तु से उसे सजाने-संवारने की दिशा में सोचने लगे हैं।</p>
<p>`लोक-रंग´ की एक खासियत यह भी रही कि उसने अपनी बहसों में किसानों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को हिस्सेदार बनाया। एक अनूठा प्रयोग भी यहां देखने को मिला, वह है लोक कलाओं को आधुनिक कला तथा बुद्धिजीवी समुदाय को गंवई जनता के साथ जोड़ने का। यह एक नई बात थी। इसीलिए लोग सोचने लगे हैं कि यदि `लोक-रंग´ अपनी निरन्तरता आगे कायम रख सका तो यह निसन्देह सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप ले सकता है और पूरब की इस पट्टी में सांस्कृतिक चेतना की एक नयी बयार महसूस की जा सकती है।</p>
<p>(कौशल किशोर की &#8216;लोकरंग २००९&#8217; पर टिप्पणी)</p>
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		<title>‘लोकरंग 2010’, 8- 9 मई के लिए महाश्वेता जी का संदेश</title>
		<link>https://lokrang.in/a-message-from-mahasveta-devi-to-lokrang-2010/551/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:30:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सन्देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;लोकरंग 2010&#8217;, 8- 9 मई के लिए महाश्वेता जी का संदेश ( A message from Mahasveta Devi to &#8216;Lokrang 2010&#8217; )</p>
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		<title>लोकरंग सांस्कृतिक समिति की अन्य मंचों पर प्रस्तुतियां</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Anurag]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 13:28:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा काशी में आयोजित व्यास महोत्सव(28 से 2 दिसम्बर 2009) में, लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने 29 नवम्बर, 2009 सांय 7 बजे अस्सी घाट पर ढाई घंटे का `लोकरंग´ कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसमें जांघिया नृत्य, फरी नृत्य और हिरावल, पटना की गायन टीमों ने देशी, विदेशी पर्यटकों को लोक गायकी एवं...</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&#8211; उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा काशी में आयोजित व्यास महोत्सव(28 से 2 दिसम्बर 2009) में, लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने 29 नवम्बर, 2009 सांय 7 बजे अस्सी घाट पर ढाई घंटे का `लोकरंग´ कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसमें जांघिया नृत्य, फरी नृत्य और हिरावल, पटना की गायन टीमों ने देशी, विदेशी पर्यटकों को लोक गायकी एवं लोक नृत्त्य से सम्मोहित किया ।</p>
<p>-लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने,&nbsp;ज.स.म.पटना के आमंत्रण पर &#8216;सृजनोत्तसव 2010&#8217; में&nbsp;14 मार्च 2010 को फरी नृत्य&nbsp;प्रस्तुत किया ।<br />
नोट- लोकरंग सांस्कृतिक समिति जनपक्षधर संस्थाओं के आमंत्रण पर अन्यत्र भी कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकती है बशर्ते कि उसके वैचारिक पक्ष को प्रभावित करने की कोशिश न की जाए ।</p>
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