लोकरंग (2011)

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‘लोकरंग -1’ और ‘लोकरंग- 2’पुस्तकें सत्र 2012-2013 से छपरा विश्वविद्यालय के एम.ए.(भोजपुरी) पाठ्यक्रम में शामिल की गई हैं ।

 

‘लोकरंग -2’ पुस्तक और लोकरंग 2011 पत्रिका (Lokrang-2 book and Lokrang 2011 Magazine)

संपादकीय (Editorial of Lokrang-2 book and Lokrang 2011 magazine)

लोकसंस्कृति के सामाजिक पक्ष को दलितों ने उकेरा है

-सुभाष चन्द्र कुशवाहा

लोकसंस्कृतियां, जिनमें लोकगीतों की व्याप्ति सबसे अधिक है, के अधिकांश रचइता दलित रहे हैं । वे सदियों तक अनपढ़ रहे । हमारी वर्णवादी व्यवस्था ने उन्हें पढ़ने का अधिकार नहीं दिया था । इसलिए वे लिखित रूप में समाज को कुछ नहीं दे पाये । 84 सिद्ध कवियों ने जो मुख्यतः दलित ही रहे, सदियों पूर्व अपनी रचनाएं वाचिक परंपरा में हम तक पहुंचाई । लिखित रूप में समाज को कुछ देने का अधिकार खास वर्गों तक सीमित था । उन्हें ही विद्वान कहलाने का अधिकार भी था । इन विद्धानों ने लोकगीतों की रचना या लोकनृत्यों के संवर्द्धन में कोई योगदान नहीं दिया । लोकगीतों के रचनाकार वे ‘गंवार’ थे जिन्होंने जीवन संघर्षों को भोगा था, अपार कष्टों को सहा था और भोगे हुए यथार्थ की ऊर्जा से लोकगीतों की रचना की थी । इसलिए हम कह सकते हैं कि लोकगीतों में बहुसंख्यक समाज का वास्तविक यथार्थ है और तमाम लिखित आदि ग्रंथों में कपोल कल्पित वृतांत । और इनमें कहीं कुछ यथार्थ है भी तो वह मुट्ठी भर खास तबके का हितपोषक है ।
गंवारों को गुमनाम रखने, उन्हें महत्वहीन बनाने के उपक्रम में ही लोकगीत रचइताओं के नाम गुमनाम रह गये । लोकगीतकार गुमनाम इसलिए भी रहे क्योंकि समाज ने उन्हें बेहतर नाम नहीं दिया था। कुकुर, नेऊर, सियार, रेंगन, बुद्धन भला अपना नाम देकर कौन सा सम्मान प्राप्त कर लेते ?
दलित चाकर थे और खास पेशे से जुड़ जाने के कारण एक खास जाति के कहे जाने लगे थे । तेली, कहार, धोबी, अहीर, हजाम, बढ़ई और कोइरी की जाति तथा कार्य अलग-अलग विभाजित होने, श्रम की विविधता और भिन्नता के कारण उन्होंने अपने लिए कुछ विशिष्ट और भिन्न लोकसंस्कृतियों का सृजन भी किया । ज्यादा श्रमप्रधान कार्य करने वाली जातियों के ही जातीय नृत्य विकसित हुए जो थके हारे समाज को अवसर या विश्राम के क्षणों में मनोरंजन कर तरोताजा कर देते थे। हिन्दुओं की 17-18 दलित जातियों के जातीय गीत और नृत्य देखने-सुनने को मिलते हैं । पंवारा गाने वाली पंवरिया और नाथ संप्रदाय से जुड़े जोगी मूलतः दलित रहे होंगे जो बाद में धर्म परिवर्तन के बाद मुसलिम बने । वे आज भी मुसलमानों के अनुसूचित जाति की श्रेणी में माने जाते हैं । उच्च वर्ग के लोग श्रम से विरत थे इसलिए उनके जातीय नृत्य देखने को नहीं मिलते जबकि हुड़का, पखावज, पंवरिया, अहिरऊ, कछवाऊ नृत्य आज भी देखने को मिल जाते हैं । अन्य श्रमशील जातियों के गाये गीत भले ही लुप्त होते जा रहे हैं फिर भी बहुत दिनों तक वे हमारे बीच रहे हैं जैसे कि तेलियों, गोड़ों, भरों,पासियों, कोरियों, वेश्याओं, कहारों, सियारमरवा, गड़ेरिया, दुसाधों, कुम्हारों आदि के गीत । लोकगीतों के क्षेत्र में भी उच्च वर्ण के पास उनके वर्ग विशेष के गीतों का अभाव रहा है ।
भोजपुरी, मगधी और मिथिला भाषा क्षेत्र में ‘दीना-भद्री’ की लोकगाथा मुसहरों के बीच और ‘सूरमा सलहेस’ और ‘रेशमा-चुहड़मल’ की लोकगाथा दुसाध जातियों के बीच, सदियों से प्रचलन में रही है । छत्तीसगढ़ की ‘कंवलाः लक्ष्मण जती गाथा’ भी अछूत देवार जाति की रचना है । बंगाल के वैष्णवी जिसमें मोची और चमार जाति के लोग हैं, ने जातिदंश को बाउल गान के माध्यम के व्यक्त किया है । दलित जातियों ने इन लोकगाथाओं के माध्यम से अपने नायकों के संघर्ष और उत्कर्ष की चर्चा तो की ही है, सनातन धर्म में मंदिर प्रवेश से विरत किये जाने के कारण अपने महापुरूषों के मंदिर स्थापित कर ब्राह्मणवाद का निषेध किया है । यहां जाति बंधन एवं स्त्री बंधन से मुक्ति का संघर्ष भी दिखाई देता है ।

अब प्रश्न उठता है कि जब अधिकांश लोकगीतों की रचना दलितों ने ही की है तो फिर उनकी जीवनचर्या, दुख-तकलीफों, जातिदंश की पीड़ा या श्रम विशेष में व्याप्त शोषण, कष्ट, उत्पीड़न की अभिव्यक्ति उनके लोकगीतों या लोकसंस्कृतियों में बहुतायत में होनी चाहिए थी, पर ऐसा है नहीं । हमारे पास जो लोकगीत संग्रहीत हैं या बचे रह गये हैं उनमें ज्यादातर धार्मिक और संस्कार गीत हैं । दलितों के जातीय गीतों में भी धार्मिक गीतों का ही बाहुल्य दिखाई देता है। यह सही है कि धर्म ने समाज को जितना प्रभावित किया है उतना अन्य किसी संस्कृति ने नहीं । इसलिए धार्मिक और संस्कार गीतों के महत्व या समाज की संस्कृति को समझने में इनके योगदान को न तो खारिज किया जा सकता है न कमतर माना जा सकता है । परन्तु हमें यह सोचने को तो बाध्य करता ही है कि जीविका के लिए पहली आवश्यकता जब श्रम था फिर लोकगीत में उसकी अभिव्यक्ति बहुतायत में क्यों नहीं है ? क्या संस्कार और धार्मिक गीतों की आड़ में जीवन संघर्षों को अभिव्यक्ति देने वाले गीतों को पीछे ढकेल दिया गया ?
जाहिर है दलित गीतों में जब दुख, तकलीफ या जातिदंश का वर्णन होता तो सवर्ण समाज निशाने पर होता । ऐसे में सवर्ण समाज जिसके पास लोकगीतों के संग्रह, उनको जीवित बनाये रखने के तंत्र मौजूद थे वे भला अपनी आलोचना या बुराई के औजारों को क्यों बचाये रखते ? शायद इसलिए लोकगीतों में दलित प्रतिरोधी तेवर सीमित दिखाई देते हैं ।
दूसरी ओर अस्पृश्यता, जुल्म और गैरमानवीय व्यवहार झेलने वाले दलितों के लिए जरूरी था कि वे अपने लिए किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश करते । इसी प्रयोजन में उन्होंने सदियों पहले हिन्दुधर्म की जातिवादी प्रवृत्ति को नापसंद कर बौद्ध, सिद्ध या नाथ परंपरा से खुद को जोड़ने का प्रयास किया । उनके इन मनोभावों को देखते हुए हिन्दूधर्मावलम्बियों ने हमले किए । जातिवादी मानसिकता का विरोध करने वाले धर्मों को यहां टिकने न दिया गया और वर्णवादी संस्कृति के एकाधिकार को स्थापित करने के लिए दलित समाज को धर्मभीरू बनाया गया । दलितों के अलग-अलग कुल देवी-देवताओं की परिकल्पना की गई । उनकी पूजा पद्धतियों, रहन-सहन, तीज त्योहार मनाने के तौर-तरीकों को अलग पहचान देकर प्रतिरोधी शक्ति को न्यून किया गया । उन्हें संस्कार के अनेक विधानों में उलझाकर श्रम का अर्क निचोड़ने वाले सवर्ण समाज ने उनकी हर संस्कृति का दैवीकरण कर दिया । वे इहलोक और परलोक की भूलभुलैया में फंस कर रह गये । उनकी संस्कृतियां अनेकों फंतासियों में उलझ कर तेज हीन हो गईं । वे कहीं जादू-टोना, कहीं भूत-प्रेत तो कहीं मनगढ़ंत लोकगाथाओं और अपने देवी-देवताओं की स्तुति गान में लग गये । ऐसे समय में ही समाज के कुलीन तबके ने उनके तमाम श्रम प्रधान महत्वपूर्ण लोकगीतों को नष्ट होने दिया या किया और धार्मिक तथा कम महत्व के या जिनसे उन्हें कुछ खास परेशानी नहीं होनी थी या जिनसे वे मात्र मनोरंजन कर सकते थे या समाज की सजगता को कुंद कर सकते थे, परंपरा में बने रहने दिया ।
एक ओर तो सुविधाभोगी समाज ने दलितों की उपेक्षा की तो दूसरी ओर अपनी सेवा के लिए उन्हें ही इस्तेमाल किया । सदियों से बच्चे की पैदाइश अस्पृश्य करार दी गई चमाइनों के हाथों होता रहा । तब न आधुनिक अस्पताल थे न नर्सें । चमाइनें ही कुशल नर्सें थीं । क्या राजा, क्या प्रजा, बच्चा जनाने का कार्य वे ही करतीं । वे तमाम सुख-सुविधाओं से वंचित थीं इसलिए अवसर हाथ लगते ही चाकरी के बदले अपनी लालसा या पीड़ा की अजीबोगरीब अभिव्यक्ति करती दिखतीं । यह उनके अंतरमन की कुंठा या प्रतिशोध की एक झलक थी । चमाइनों द्वारा बच्चा जनाने के कार्य को दर्शाने वाले तमाम लोकगीत मौजूद हैं । कुछ गीतों में चमाइन बुलावा आने पर जहां रानी के कंजूस होने या अपशब्द बोलने की शिकायत करती है, वहीं कई बार चलने के लिए रानी की पालकी की मांग कर बैठती है ।
भुइंया हम नाहिं जायब, पांव भींगि जाई नू हो,
आरे, ले आव ऽ रानी सुगपाल, ओहि चढि़ जाइब हो ।1
……….
जाहु राजा घरे आपन, हम नाहिं जाइबि हो
ए राजा, तोर धनि हाथवा के सांकरि, मुंहवा के फूहरि बोलहूं ना जानेलि हो
………………
हथिया चढ़त मोरा डर लागे, घोड़वा पर ना चढ़ेब हो
ए राजा, भेजि देहु रानि सुखपाल, ओहि रे चढि़ जाइबि हो ।2

यानी ऐसे समय में चमाइन राजमहल चलने के लिए रानी की पालकी(सुगपाल/सुखपाल) की ही मांग कर बैठती है । वह जानती है कि कम से कम आज तो उसकी लालसा पूरी ही होगी ।
तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद ज्योंही दलितों को कुछ पढ़ने -लिखने का अवसर मिला, उन्होंने अपने प्रतिरोधी तेवर को मूर्त रूप दिया । संत साहित्य में अनेक कवियों ने छुआछूत, पाखंड और कर्मकांडों का विरोध कर निर्गुण विचारधारा को स्थापित किया । लोकसंस्कृति की विस्तृत परंपरा में सैकड़ों महत्वपूर्ण गीतों/काव्यों की रचना हुई । सिद्ध साहित्य और संत साहित्य का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है । हमारे बीच कुछ महत्वपूर्ण लोकगीत सुरक्षित रह गये हैं जो यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि ‘गंवारों’ की रचनाएं तत्कालीन विद्वानों की रचनाओं से कहीं अधिक महत्व की हैं ।
सन् 1856 में देश में भीषण अकाल पड़ा था । राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के दलितों को शायद सबसे अधिक कष्ट उठाना पड़ा था । उन्होंने अपने कष्ट को लोकगीत में इस प्रकार व्यक्त किया –
छपनिया काल रे छपनिया काल
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में ।
आइयो जमाइड़ो धड़कियां जीव
कां ते लाऊं शक्कर, भात, घीव, जमाइड़ो ?
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में ।
छपनिया काल रे छपनिया काल
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में ।3
स्त्री कहती है कि उसकी देवरानी के स्तनों का दूध भी सूख गया है, नहीं तो शायद इसी दूध की चार बूंदें जमाइड़ों के मुंह में टपका दी जातीं । बस्तर की पहाडि़यों में गाया जाने वाला माडि़या लोकगीतों में संघर्षशील जीवन के कठोर सत्य को कितना समीप से देखा और व्यक्त किया गया है, एक उदाहरण से समझा जा सकता है –
माव देसेन दुक्काड़, दादा ले देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले,
देसेन कोंदा डलता, दादा ले देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले!
अच्चाम नांगेलिन बाड़की तुम देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले
दुक्काड़ देसेन बाड़वत्ते देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले,
निम्मा बत्तीन ममों डोलूमून तोन देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले!
गंगा ना पेपी जप के डोलती देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले,
जनदे ना पेड़ी जट के डोलती देसु दुक्काड़ अत्ता, दादा ले!
अर्थात् -हमारे देश में दुर्भिक्ष है, ओ भई, देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया, ओ भाई! देश में बैल मर गए, ओ भाई,! देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया, ओ भाई! खाली हलों का क्या करेंगे ? देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया, ओ भाई! रे दुष्काल ! तू देश में क्यों आया ? देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया, ओ भाई! तू आया तो हम मर रहे हैं । देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया,ओ भाई! गंगा का दादा झट मर गया, देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया, ओ भाई! जनदे की दादी शीघ्र मर गई, देश भर में दुर्भिक्ष पड़ गया, ओ भाई!4
दलितों द्वारा रचित कुछ लोकगीत, उनके लिए भी जिज्ञासा के विषय हैं जिन्होंने कभी ‘गंवारों’ की संस्कृति समझ, अनदेखा कर दिया था । शायद इसलिए कि दलितों की संस्कृति में समाज का यथार्थ और अक्स दोनों दिखाई देता है । समाज के संपन्न तबके की संस्कृति गैर सामाजिक, और आत्म केन्द्रित रही । उसकी आत्मा स्वान्तःसुखाय और अभिजात्यवर्गीय रही जबकि दलितों की लोकसंस्कृति श्रम, संघर्ष और सत्ता के अमानवीयता के विरूद्ध रही । सवर्ण समाज जहां एक ओर लोकसंस्कृतियों के बहाने अपनी कुलीनता का लबादा और सख्त करने की कोशिश करता गया वहीं दलितों ने लोकसंस्कृतियों के माध्यम से अपने ऊपर लादे गए तमाम वर्जनाओं यथा छुआछूत, धार्मिक निषेधों और ऊंच-नीच की दीवारों पर दस्तक दिया और उनको हिलाने के खतरे उठाये । हीरा डोम( जन्म-काल 1885 या 1886 ई. के आसपास ) की एक मात्र प्राप्त कविता अपने तेवर और तंज के लिए मील का पत्थर बनी हुई है । यहाँ हीरा डोम की ऐतिहासिक कविता का मूल पाठ दिया जा रहा है जो ‘सरस्वती’ में 1914 में छपी थी और शायद इसी कारण कवि का नाम और यह कविता जिंदा बच गई । हमने डा0राजेन्द्र प्रसाद सिंह की किताब ‘आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य’ से इसे टिप्पणी सहित साभार लिया है-
हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेबे से मिनती सुनाइबि
हमनी के दुख भगवनवो न देखता जे
हमनी के कब ले कलेसवा उठाइबि
पदरी सहेब के कचहरी में जाइबि जा
बेधरम होके रंगरेज बनि जाइबि
हाय राम! धरम न छोड़त बनता बा जे
बेधरम होक कइसे मुँहवा देखाइबि।।1।।
खंभवा के फारि पहलाद के बँचवले जे
ग्राह के मुँहे से गजराज के बँचवले
धोती जुरजोधना के भइया छोरत रहे
परगट होके तहाँ कपड़ा बढ़वले
मरले रवनवा के पलले भभिखना के
कानी अँगुरी पे धके पथरा उठवले
कहवाँ सुतल बाटे सुनत न बाटे अब
डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले ।।2।।
हमनी के राति दिन मेहनत करीले जा
दुइगो रूपयवा दरमहा में पाइबि
ठकुरे जे सुख से त घर में सुतल बानी
हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि
हकिमे के लसकरि उतरल बानी जे
त अइओं बेगरिया में पकरल जाइबि
मुँह बान्हि ऐसन नोकरिया करत बानी
ई कुलि खबरि सरकार के सुनाइबि ।।3।।
बभने के लेखे हम भिखिया न माँगब जा
ठकुरे के लेखे नहिं लउरी चलाइबि
सहुआ के लेखे नहिं डांड़ी हम मारब जा
अहिरा के लेखे नहिं गइया चोराइबि
भँटऊ के लेखे न कबित हम जोरब जा
पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि
अपना पसीनवा के पइसा कमाइबि जा
घर भर मिलि-जुली बाँटी-चोटि खाइबि।।4।।
हड़वा मसुइया के देहियाँ ह हमनी के
ओकरे के देहिया बभनओ के बानी
ओकरा के घरे-घरे पुजवा होखत बा जे
सारे इलकवा भइलें जजमानी
हमनी के इनरा के निगिचे न जाइले जा
पाँके में से भरि-भरि पिअतानी पानी
पनही से पिटि-पिटि हाथ गोड़ तुडि़ देलें
हमनी के एतनी काही के हलकानी ?5।।
{ हीरा डोम की यह कविता हिंदू समाज में व्याप्त जाति-प्रथा पर सीधे चोट करती है। समाज का एक तबका आराम से बैठकर खा रहा है और दूसरा तबका काफी श्रम करने के बावजूद भी दाने-दाने के लिए मोहताज है। कवि हीरा डोम ने अपने अछूत जीवन की संपूर्ण वेदना को इस कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। वह यह विनती अपने साहब को सुनाना है। कहता है कि हमलोग रात-दिन कष्ट भोग रहे हैं पर हमलोगों का दुख ईश्रर भी नहीं देख रहा है। तब आखिर हमलोग कब तक यह कष्ट भोगते रहेंगे। मेरा मन तो यह कहता है कि पादरी साहब की कचहरी में उपस्थित होकर अपना धर्म-परिवर्तन कर लें। परंतु दूसरा मन
धर्म-परिवर्तन से रोकता है कि आखिर तुम ऐसा करके और बेधर्म होकर समाज के समक्ष कैसे मुँह दिखलाओगे? दूसरे छंद में कवि पौराणिक प्रसंग को याद करता है और कहता है कि तुमने कभी खंभे को फाड़कर भक्त प्रहलाद की जान बचाई है और कभी ग्राह के मुँह से गजराज की रक्षा की है। इतना ही नहीं, तुमने तो चीरहरण के वक्त दुर्योधन के खिलाफ द्रौपदी की रक्षा भी की है। तुम्हारे रक्षात्मक कार्यों की एक लंबी सूची है। तुमने रावण को मारकर विभीषण का पालन किया है। कृष्णावतार में तुमने अपनी कानी अँगुली पर गोवर्द्धन पर्वत को उठाया है। पर मेरी विपत्ति के समय तुम कहाँ सो गए हो कि सुनते ही नहीं । क्या तुम मुझे डोम समझकर छूने से डर रहे हो? तीसरे छंद में कवि ने अपने कठोर श्रम का वर्णन किया है जिसके बदले में दो रूपया प्रतिमाह वेतन मिलता है। ठाकुर सुख से अपने घर में सोए रहते हैं और हमलोग खेत जोत-जोतकर कमाते हैं। हाकिम की जब फौज आती है, तब वह भी बेगारी करवाती है। हम तो एक सफाईकर्मी हैं जो मुँह बाँधकर अपनी सेवा देते हैं। (इससे सिद्ध होता है कि हीरा डोम सफाईकर्मी ही थे।) मुझे ये सभी खबरें सरकार को सुनानी है। हम तो ब्राह्मणों की भाँति भीख भी नहीं मांग सकते हैं। हम तो क्षत्रियों की भाँति लाठी भी नहीं चला सकते हैं। हम तो साहुओं की तरह डंडी भी नहीं मार सकते हैं। हम तो अहीरों जैसा गाय भी नहीं चुरा सकते हैं। हम तो भाँटो की तरह मनगढ़ंत प्रशस्तिमूलक कविताएँ भी नहीं रच सकते हैं। हम तो पगड़ी बाँधे कचहरी में भी नहीं जा सकते हैं। ये सभी कर्म हमलोगों की आत्मा के खिलाफ हैं और समाज इसकी छूट भी हमें नहीं देता है। हमलोग तो सिर्फ पसीना बहाकर कमानेवाले जीव हैं। उस पसीने की कमाई को हमलोग आपस में बाँटकर खाते हैं। अंतिम छंद में हीरा डोम ने जातिगत आधार पर ऊँच-नीच की बात को तार्किक ढंग से खारिज करते हुए कहा हैं कि शूद्र और ब्राह्मण दोनों का शरीर एक जैसे हाड़-मांस से बना हुआ है। पर ब्राह्मणों की पूजा क्यों घर-घर में की जाती है? यहाँ तक कि उसकी यजमानी पूरे इलाके में चलती है। दूसरी तरफ उसी हाड़-मांस से बने हुए डोमों को क्यों नहीं कुएँ के पास पानी भरने के लिए जाने दिया जाता है? हम लोग तो कीचड़ से पानी निकालकर पीने के लिए विवष हैं। इतना ही नहीं, यदि हमलोगों से किसी सवर्ण की चीजें नापाक हो जाती हैं तो हमें जूतों से पीटा जाता है। आखिर क्यों हमलोगों को इतना परेशान किया जाता है? }5
मुसहर कवि बिहारी राम ( गाँव-एकवारी, थाना-सहार, जिला- भोजपुर, बिहार )सामंती जुल्म के खिलाफ लिखने का साहस करते हुए कहते हैं कि -कइसे सुधरी, कइसे सुधरी
जिनकर बिगड़ल बा चलनिया
कइसे सुधरी, कइसे सुधरी
रात-दिन बेगार करावे, मारे-पीटे और डेरावे
हमनी के इज्जत पर हरदम ऊ रखेला आँख
देखली धनिकन के शैतनिया
कइसे सुधरी, कइसे सुधरी
जिनकर बिगड़ल बा चलनिया ।6

डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने अपनी पुस्तक-आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य में लिखा है -‘हीरा डोम की कविता एक सधे हुए कवि की रचना है। यह कविता वर्णिक है। इसका छंद मनहरण घनाक्षरी है जिसमें 16 या 15 वर्ण पर यति होती है और जिसका अंतिम वर्ण गुरु होता है। निष्चित रूप से ‘अछूत की षिकायत’ अपने संरचना-षिल्प के कारण याद की जाएगी। परंतु इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि यह हीरा डोम की पहली रचना नहीं रही होगी। भाव, संरचना-षिल्प और प्रतिपाद्य की दृष्टि से यह कविता अत्यंत बेजोड़ है। इसीलिए यह कहा जा सकता है कि यह कविता किसी सधे हाथों की रचना है और हाथ तो तभी सधते हैं, जब कोई रचनाकार इसका पूर्वाभ्यास करता है। कहना न होगा कि ‘अछूत की शिकायत’ के पहले और बाद में भी हीरा डोम ने अपनी कई रचनाएँ प्रस्तुत की होंगी। परंतु समय के साथ-साथ उनकी सभी रचनाएँ इतिहास के नीचे दफन हो गईं। यदि ‘अछूत की षिकायत’ भी ‘सरस्वती’ जैसी तथाकथित प्रतिष्ठित पत्रिका में नहीं प्रकाशित होती तो यह भी इतिहास के नीचे दफन हो जाती।’ मैंने भी ‘लोकरंग-1’ में इस आशंका को उठाया था कि हीरा डोम की कविता के तेवर देखते हुए लगता है कि उनकी तमाम कविताओं को समाज के कुलीन तबके द्वारा नष्ट कर दिया गया होगा ।
डा0 राजेन्द्र प्रसाद सिंह आगे लिखते हैं -‘इतना ही नहीं, यह भी सत्य है कि हीरा डोम की तरह और भी कई प्रतिभाषाली कवि उस वक्त मौजूद थे। परंतु वे हिंदी साहित्य के इतिहास की मुख्य धारा में नहीं आ सके। ऐसा हीरा डोम के पहले भी हुआ, बाद में भी हुआ और आज भी हो रहा है। डा. जयप्रकाश कर्दम ने लिखा है कि हाल के वर्षों में इस दिशा में नई खोजों से कुछ नए तथ्य सामने आए हैं। भारतेंदु हरिष्चंद्र के समकालीन ‘मार्कण्डे’ दलित कवि थे। वे ‘चिरंजीत’ नाम से लिखते थे। वे गाजीपुर के रहने वाले मोची थे। उसी काल में इलाहाबाद निवासी ‘परसन’ नामक दलित कवि भी कविताएँ लिखते थे। हीरा डोम के ही समकालीन दूसरे महत्वपूर्ण कवि स्वामी अछूतानंद हरिहर हैं। अछूतानंद की पहली पुस्तक ‘हरिहर भजनमाला’ 1917 ई. में आगरा से प्रकाशित हुई थी। कहने का तात्पर्य यह है कि हीरा डोम का रचना-संसार और भी व्यापक रहा होगा और यह भी कि और भी कवि उनके समय में मौजूद रहे होंगे जो दलित वर्ग से आते होंगे। पर सभी काल-कवलित हो गए। जरूरत इस बात की है कि उन कवियों की हम तलाश करें जो अपनी प्रतिभा के रहते हुए भी काल के गर्त में समा गए हैं।’ दरअसल इतिहास ने सदा कमजोरों की आवाज दबाई है और लोकसंस्कृतियों के क्षेत्र में भी वही हुआ है ।
समाज के कुलीन तबके ने लोकसंस्कृतियों के संवर्द्धन में नकारात्मक भूमिका निभाई है । गीतों में अश्लीलता को बढ़ाने में उसी का हाथ और दिमाग रहा है । कुछ लोग मेरी बात से असहमत होते हुए यह कह सकते हैं कि अनेकों राजे-रजवाड़ों के काल में या जमींदारों के संरक्षण में नौटंकियों का विकास हुआ । बात सामान्य तौर पर सही भी दिखती है । पर जरा सोचिये कि इन नौटंकियों में अधिकांशतः दलितों ने ही क्यों भाग लिया ? तमाम नाच यथा हुड़का, पखावज, फरी, जांघिया, राई, लोरिकायन, पंवरिया, ये सब जाति विशेष के नाच थे और इनमें मात्र दलितों की ही भागीदारी थी । कुलीन तबका इनको नचा कर अपना मनोरंजन करता था और बदले में अपनी कुलीनता की धाक जमाने के लिए अभद्र टिप्पणियों से इन्हें नीच और अपने को कुलीन दर्शाता था। सारी लोक गायकी और नृत्य दलितों के ही नाम क्यों है ? कहीं-कहीं उच्च जातियों की नौटंकियों में भागीदारी है भी तो ज्यादातर रामलीलाओं या धार्मिक नृत्यों में । वे वहीं अपने को सहज महसूस करते थे । जबकि वे सदियों पुरानी सिद्ध, नाथ या कबीर पंथ परंपरा से अलग रहे । वहां दलितों ने ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई । यहां तक कि वर्णवादियों ने इन परंपराओं पर प्रहार कर उनके विकास की राह में रोड़े अटकाये और सदियों तक दबाये रखा । जब कुलीन तबके को लगा कि अब उसके सामने मनोरंजन के अन्य दूसरे साधन आ चुके हैं और श्रम के लिए सिर्फ दलितों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है तब उन्होंने लोकसंस्कृतियों की उपेक्षा कर अश्लील संस्कृतियों को बढ़ाने में रुचि दिखाई ।

समाज के समर्थ तबकों ने अपनी बुद्धि के एकाधिकार के चलते जहां एक ओर दलितों के खेतिहर तबकों को जिन्हें आज पिछड़ा वर्ग में गिना जाता है, के माध्यम से अति शूद्रों को अपमानित करने, उन्हें नीचा दिखाने के लिए कुछ गीतों या कहावतों की रचना की और उसे प्रचारित कर दलितों के सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को हतोत्साहित करने की कोशिश की । बचपन में मैंने भी तमाम ऐसे गीतों को सुना है जो सीधे-सीधे समाज के दलित तबके का अपमान करती हैं -‘डोम, चमार सदा होशियार, जहां लूट पड़े तहां टूट पड़े, जहां मार पड़े वहां भाग पड़े ।’ ऐसी शरारतपूर्ण पंक्तियां लिखने वाला इतना तो स्वयं व्यक्त कर देता है कि समाज का दलित तबका इतना कमजोर था कि उच्च जातियों के जुल्मों के आगे भाग खड़े होने के अलावा उसके पास दूसरा चारा न था । वह दाने-दाने को मोहताज था । भूखा था और क्षुधापूर्ति के लिए कभी-कभी व्यग्र दिखता था जिसे संपन्न तबका ‘लूट पड़े तो टूट पड़े’ व्यक्त करता है । इस भूख को मिटाने के लिए जहां दलित तबका जीवन-मरण में श्राद्ध खाने के लिए अपने-अपने क्षेत्रों का निर्धारण करता तो उस पर अभिजात्य वर्गीय नजरिया देखिये-‘राजा के पते ना, डोम गांव बांट लेहलस’ या ‘मरला पाछे, डोम भईलन राजा ।’
मैंने ‘लोकरंग-1’ के संपादकीय में घाघ की कहावतों में भी इस प्रकार की जातिसूचक पक्तियों का उल्लेख किया था । ‘गगरी अनाज भइल, जोलहन के राज भइल’ पक्तियां लिखने वाले गरीब जुलाहे की गरीबी का मजाक उड़ाते दिखते हैं तो ‘दुसाध जात खाए नीचे, ताके ऊंचे’ कह कर दलित समाज की महत्वकांक्षा को कुंद करने की कोशिश की जाती रही है । ‘कोइरी के लड़िका नान्हें हीन, हाथ में खुर्पी मोथा बीन’ या नोनिया बीन, करम के हीन ’ कह कर एक तबके के सुविधाभोगियों ने आगे बढ़ने की संभावना को नकारा है तो ‘नाऊ, धोबी, दरजी, तीनों जात अलगरजी’ और ‘कलवारे की बिटिया भूखन छपिटात रहे, तबो लोग कहे कि पियले बिया ।’ कह कर गरीब जातियों को अपमानित किया गया है ।
समाज का कुलीन तबका जहां पौराणिक कथाओं, उपकथाओं और उनसे जुड़े अनेक मिथकों की रचना कर भाववादी संस्कृति का ताना बाना बुन रहा था वहीं दलितों ने पौराणिक कथाओं का जनसामान्यीकरण करते हुए तमाम लोकगाथाओं की रचना की । लोरिकायन, आल्हा-उदल, रानी सारंगा, भर्तृहरी, सोरठी-बृजभार, राजा घुघुलिया, रइया रणपाल, कलार सुंदरी आदि लोकगाथाओं की रचनायें हमारे पास हैं । कई दलित समाजों ने अपने कुल देवताओं के संबंध में लोकगाथाओं की रचना की । अपने धर्म विधानों का प्रतिपादन किया परन्तु खेद का विषय है कि अपने दलित नायक/नायिकाओं के बेजोड़ चरित्र निर्माण करने की चाहत में दलित रचनाकारों ने लोक गाथाओं का ऐसा मिथकीय स्वरूप निर्धारित किया कि अंततः वे भी आध्यात्मिक शक्तियों से लैश हो हमारे सामने आये और मानव से परम मानव की ओर अग्रसर हो दलितवर्गीय प्रतिरोधी संस्कृति से दूर हो गये ।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लोकसंस्कृतियां दलितों की थाती हैं । वे अनपढ़ और कमजोर समाज की अभिव्यक्ति हैं । उनका संरक्षण, सर्वहारा संस्कृति का संरक्षण है । भले ही ऐसी संस्कृति में अनेक मिथ्या, कपोलकल्पित और अंधविश्वासी तत्व भी हैं फिर भी वह बहुत कुछ है जिसे लिखित इतिहास ने तोप-ढांप रखा है ।
लोकरंग-2 में हमने प्रयास किया है कि विभिन्न अंचलों की तमाम लोकगाथाओं का विवेचन प्रस्तुत किया जाए । हमने कुछ आदिम जातियों यथा संथाली, डोगरा, थारू और बोक्साओं की संस्कृतियों को भी इस पुस्तक में समेटने का प्रयास किया है । मिथ का समाजशास्त्र, ख्याल लावनी, भिखारी ठाकुर का तमाशा और लोक साहित्य में दलित संस्कृति पर आलेख तो हैं ही, कुछ गुमनाम लोकगीतकारों पर भी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई गई है । लोक कथा, लोक गीत, लोक नृत्य के कुछ अनछुए पृष्ठों पर नजर डाली गई है । परिशिष्ट के अंतरगत लोकसंस्कृतियों से संबंधित कई सूक्ष्म परन्तु महत्वपूर्ण जानकरियां उपलब्ध कराई गई हैं । लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने अपने सदस्यों और दूसरे माध्यमों से कुछ पचरा, झारी, संझा, पराती, तेली गीत और जंतसर गीतों का संग्रह किया है जो परिशिष्ट के अंतरगत दिए गए हैं । पूर्वांचल के हिन्दी पट्टी में एक अनोखी संस्कृति विराजमान रही है जो सदियों से धर्म आधारित विभाजन से परे हिन्दू-मुसलिम विभाजन को नकारती रही है । पमरिया(पंवरिया) और जोगी परंपरायें ऐसी ही संस्कृति के अभिन्न हिस्से हैं जहां दलित हिन्दू, मुसलमान बनने के बाद भी अपनी पूर्व परंपरा से मुक्त नहीं हो पाया है और एकाकार संस्कृति को जिंदा रखे हुए है । यहां हमने पमरिया नाच पर महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित किया है । मैं इस पुस्तक के सभी रचनाकारों का आभारी हूं जिन्होंने हमारे अनुरोध पर महत्वपूर्ण सामग्रियों को उपलब्ध कराया है । कथादेश के संपादक हरिनारायण जी ने अपनी पत्रिका के काम के अतिरिक्त इस पुस्तक के प्रकाशन में जो समय दिया है उसको मैं नजरअंदाज नहीं कर सकता । आशा कुशवाहा ने हमेशा की तरह संग्रह को उपयोगी बनाने में अपना योगदान दिया ही है । उम्मीद करता हूं कि यह पुस्तक पाठकों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी होगी ।
अप्रैल 2011
‘सृजन’
बी 4/140 विशालखंड, गोमतीनगर,
लखनऊ 226010

संदर्भः-1- सोहर संख्या 49, भोजपुरी संस्कार गीत, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना ।
2- सोहर संख्या 51, भोजपुरी संस्कार गीत, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद,पटना ।
3-प्रतिनिधि रचनाएं(खंड-1)-देवेन्द्र सत्यार्थी पृष्ठ 287 ।
4-प्रतिनिधि रचनाएं(खंड-1)-देवेन्द्र सत्यार्थी पृष्ठ 291 ।
5- आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य- डा0राजेन्द्र प्रसाद सिंह
6-आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य- डा0राजेन्द्र प्रसाद सिंह

 

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