लोकरंग (2010)

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`लोकरंग – २०१०´ पत्रिका (Lokrang 2010 Magazine)

संपादकीय (Editorial of Lokrang 2010 magazine)

श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

लोकगीतों का सृजन, सदियों पूर्व बालकंठों और स्त्रियों के अन्तस्थल से हुआ होगा । पुरूषों ने इस क्षेत्र में बाद में प्रवेश किया होगा । ऐसा अनुमान करने के पीछे तमाम कारण हैं । पहला तो यही कि जंगली जानवरों से भय-व्याप्ति के कारण बच्चों ने स्वर दिया होगा:-उटवा-घुटवा, मनारी बाबा पूइ, आज खाबे खिचड़ी, बिहान खाबे घीउ ।´ भूख से बिलबिलाते बच्चों ने आकाश में बगुलों को देख गाया होगा-बगुला, बगुला कहां जात बाड़, हेने आव चाउर द, खुदी द, तहरा बियाह में पानी भरेब । बाद में बच्चों के माध्यम से महिलाओं ने स्वर दिया होगा:-
काच-कुच कौआ खाला ।
दूध-भात बाबू खाला ।
पत्ता उधिआइल जाला ।
कौआ लजाइल जाला ।
बाबू के मुंहवा बिटोरले जाला ।1
लोकगीतों की प्रारंभिक अवस्था में लयप्रधान निरर्थक गीतों की ही रचना हुई होगी। जैसे कि -ओक्का, बोक्का तीन तलोक्का । बाद की अवस्था में अन्त्यानुप्रास रहित लयप्रधान गीतों का सृजन हुआ होगा ।2 इस स्थिति में स्त्रियों ने लोकगीतों को अभिव्यक्ति के मुख्य माध्यम के रूप में सोहर, जन्तसर, निरवाही गीतों को गाया होगा ।
समूह की अवधारणा पर आधारित लोकगीत, स्त्रियों की रुचि, कल्पना और संघर्ष की अभिव्यक्ति के सबसे पुराने माध्यम रहे हैं । या यों कहें कि लोकगीत श्रम करने वाली महिलाओं के ज्यादा करीब रहे हैं । कहरवा, बनज़रवा, पंवारा, बिरहा गीतों के माध्यम से बाद में पुरूषों ने अपने मन विनोद के लिए प्रवेश किया होगा । तब तक स्त्रियां, लोकगीतों में मंज चुकी होंगी और उन्होंने कजरी, लाचारी आदि तुकान्त गीतों का सृजन किया होगा । यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अधिकांश लोकगीतों के सर्जक और संरक्षक स्त्रियां ही हैं । समाज द्वारा उपेक्षित स्त्री समाज ने लोकगीतों में अपना नाम देने का साहस न किया होगा, जिससे लोकगीतों के रचइता अनाम रह गए ।

गंवई समाज में केवल जन ही नहीं होते, अपितु जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पतियां, मौसम, पेड़-पौधे सब कुछ शामिल होते हैं । तभी तो बेटी अपने बाबा से कहती है:-
बाबा निमिया के डाल जनि काट, निमिया चिरईया बसेर ।
लोकगीतों में गंवई समाज है । श्रम और संस्कार है । श्रम से जुड़े होने के कारण लोकगीतों का दायरा बरसात की फुहार से लेकर बंसत की मधुरता और चैत की निश्चिन्तता से जुड़ती है । ये सुबह और शाम से भी जुड़ते हैं और भोर के उल्लास और रात की आराम तलबी से भी । लोक की संवेदना हर्ष, वियोग और श्रृंगार से अभिव्यक्ति पाती रही है । कुछ हद तक मांसलता को भी स्थान मिला है पर कुछ वर्जनाओं के साथ । चंचलता, चुहलता, और थिरकन का सम्बंध श्रम, दुख, भूख को भुलाने और जिजीविषा की ऊर्जा बटोरने के लिए हुआ है ।
पुत्रविहिन स्त्री को तिरस्कार के जो दंश झेलने पड़ते हैं, स्त्रियां गीतों में उसे व्यक्त करती हैं:- सासु कहेली बांझिन, ननद बिनदाबासी हे, आरे बिधि जेकर बारी बिआही, से ही घर से निकालेले हे ।3 बेमेल विवाह का दर्द लोकगीतों में इस प्रकार व्यक्त करती हैं:- सबके तू देहल भोला, अन धन सोनवा, बनवारी हो हमरा के लरिका भतार । या हाय, हाय प्यारी गोरी, अबहीं सइयां तोरे लरिका ।4 लोक की जिजीविषा को बनाए रखने में लोकगीतों का बड़ा हाथ रहा है । तभी तो हरिनी कहती है: -मचिया बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो । रानी मास रउरा सीझेला रसोइया, खलड़ी बकसि देहु हो ।5 यहां स्व के बजाए आम का ख्याल रखने की परम्परा है:- बहिनी जवनि जिनिसिया दिहे रहलिउ हो ना । बहिनी तवनि जिनिसिया लेइ लेतू हो ना ।6 लोकगीतों ने कई बार संघर्ष की बुनियाद तैयार की है:- काले कांकर क बिसेनवा चान्दे गाड़े बा निसनवा ।´7 कई बार इन्होंने अन्याय के विरूद्ध आम जनता को जगाया है, उन्हें गोलबन्द किया है । जाहिर है लोकगीतों का यह चरित्र, शोषकों के विरूद्ध रहा है इसलिए उन्होंने लोकगीतों की धार कुन्द करने के लिए इसे फूहड़पन की चासनी में डुबो कर, इनके मूल चरित्र को बदलने की कोशिश की है । आज भोजपुरी फिल्मी गानों में यही सब देखने-सुनने को मिल रहा है ।
लोकगीत, श्रम के आधार पर, मौसमों के आधार पर, जाति-वर्ग के आधार पर या जीवन-मरण के अवसर, कुअवसर पर गाए जाते रहे । गाते-गाते ये गीत लोकगाथा बने । पूर्वांचल के पंवरियों द्वारा गाए जाने वाले पंवारे लोकगाथा ही हैं । अनावश्यक विस्तार के कारण ही लोकोक्तियों में कहा गया है कि- `पंवारा मत सुनाइए ।´ लोक गीतों में छोटे-छोटे पदों से लेकर लोकगाथा में पुस्तकाकार रचना देखने-सुनने को मिलती है । कजरी, लचारी जैसे टेकयुक्त गीत, दस से बारह पंक्तियों तक होते हैं जबकि बिरहा, छिटका कहरवा जैसे टेक रहित मुक्तक गीत, चार और ढाई चरण के तथा सोहर सामान्यतया पन्द्रह-बीस पंक्तियों का होता है । जन्तसर गीत (जान्त पर आटा पीसते समय गाया जाने वाला गीत) और निरवाही गीत(सोहनी के समय गाया जाने वाला गीत ) के आख्यानक प्राय: पचास पंक्तियों तक होते हैं । लोकगाथाएं बहुत लम्बी होती हैं और सप्ताह भर से कम में समाप्त नहीं होतीं । विषय की दृष्टि से लोकगाथा का क्षेत्र महाकाव्य के समान विस्तृत होता है ।
लोक गाथाएं वैसे तो एकल गायक द्वारा ही गाई जाती हैं लेकिन डेवढ़ भरने के लिए एक-दो सहगायक भी होते हैं । इन सहगायकों के लिए लोकगाथा का याद होना अनिवार्य है तभी मुख्य गायक लोकगाथा को निभा सकता है । आल्हा का सहगायक उतराई का चरण लोक लेता है और मुख्य गायक उसके गा चुकने तक दमभर कर आगे की तैयार करता है । लोकगाथा में गद्य के अंश भी होते हैं । बनज़रवा अथवा पंवारा का गायक जब दम खींचकर-`रे ना ´ कहे तो समझना चाहिए कि यहां विराम है । अलग-अलग लोकगाथाओं में अलग-अलग वाद्य यन्त्र प्रयुक्त होते हैं । जोगियों द्वारा गाये जाने वाले `राजा भरथरी´ और `गोपीचन्द´ जैसी लोकगाथाएं सारंगी पर गायी जाती हैं । `लोरकी´ और `चनैनी´ का साज करताल है । `पंवारा´ सूप बजाकर गाया जाता है । लोकगाथा के गायन में नृत्य प्राय: नहीं होते । सिर्फ पूर्वांचल के लुप्तप्राय हो चले पंवरिये, कदमताल बदल कर कुछ नाच लेते हैं ।
लोकगीत, नृत्य और सहगान की अवधारणा पर आधारित हैं । समूह में बीस से पच्चीस स्त्रियां तक गाती हैं । झूमर गीत का नाम झूम-झूम कर गाने के कारण ही पड़ा है । लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव का महत्व होता है । लोगों की चेतना को झकझोरने में भाव ही ज्यादा उपयोगिता होता है । यहां शास्त्रीय संगीत जैसा आलाप-तान, आरोह-अवरोह, ताल-लय प्राय: नहीं होते । लोकगीतों के अपने आरोह-अवरोह हैं । उनकी अपनी लय-गति है । लोकगीतों में संगीत की सात ध्वनियों के बजाय आरम्भिक पांच ध्वनियों- सा, रे, ग, म, प का प्रयोग होता है । लोकगीतों में ध्वनि और अर्थ दोनों महत्वपूर्ण हैं । जबकि ध्रुपद, धमार, और खयाल जैसे शास्त्रीय संगीत में घ्वनि का महत्व अधिक है । लोकसंगीत से प्रभावित ठुमरी, दादरा और टप्पा में अर्थ का अपना विशिष्ट महत्व है । शायद यही कारण है कि लोकगीत आम जनता में प्रिय हैं जबकि शास्त्रीय संगीत सामन्ती घरानों में । लोकगीतों में राजा दशरथ, नन्द भी औसत किसान हैं । यहां कैकेयी और धगरिन दोनों एक जैसे हैं । नि:सन्तान राजा का मुंह डोमिन भी देखना पसन्द नहीं करती:-सूतल डोमिन उठि बइठेली, डोम के जगावेली हो । ए डोम, देखली निरबंसिया केरा मुंह, कूसल नाहि परेला हो । राजा डोमिन की बात सुन घर जाता है और भोजन नहीं करता है । रानी के पूछने पर कारण बताता है:-ए रानी, जुठवा के पतरी डोमिनिया, निरबंसिया नउआ धरेले हो ।8
लोकगीतों में प्राय:त्रिताल(16 मात्रा) और चौताल(12 मात्रा) चलता है । पुत्र प्राप्ति की कामना, प्रेम, नफरत आदि का चित्रण सोहर के माध्यम से होता रहा है । जन्तसर और निरवाही गीत, सोहर के बाद लिखे गए जान पड़ते हैं क्योंकि निरवाही और जन्तसर का रूप-विधान सोहर जैसा अनियन्त्रित और लचीला नहीं है । सम्भवत: तब तक लयों की जानकारी हो चुकी थी । कहांरों का कहरवा भी सोहर की तरह लय पर आधारित है । लेकिन इसकी बन्दिश अत्यन्त ठस और नियन्त्रित होती है ।
पहली सदी के लोकगीतों की एक झलक हमें `गाहा´ छन्द में दिख जाती है । अहीरों का जातीय गीत बिरहा, इसी युग की उपज जान पड़ता है ।9 कहा जाता है अहीर कितना भी चतुर क्यों न हो, बिरहा छोड़कर और कुछ नहीं गायेगा: -कतनो अहिरा होवे सयान, बिरहा छोड़ि ना गावे आन । बिरहा, विरह का गीत है:-पिया पिया कहत पियरी भइली देहिया, लोगवा कहेला पिण्ड रोग । गंऊवां के लोगवा मरमियो ना जानेला, भइलबा गवनवा ना मोर । छोटा बिरहा चारकड़िया कहा जाता है । इसमें चार चरण होते हैं । बड़ा बिरहा लोकगाथा जैसा होता है । वैसे वास्तविक बिरहा चारकड़िया ही होता है । बिरहा में केवल डेवढ़ भरी जाती है । इसका प्रादुर्भाव अपभ्रंश के गाहा छन्द से हुआ है ।
बारहमासे और ऋतु सम्बंधी गीत-कजली, फगुआ, चैता भी बिरहा युग की देन जान पड़ते हैं । कजरी, स्त्रियों द्वारा वर्ष ऋतु में गाया जाने वाला गीत है । तुकान्त गीतों में कजरी सबसे लचीला छन्द है । इस गीत की उत्पत्ति का श्रेय मिर्जापुर(उ0प्र0) को जाता है । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की तृतीया, कजली तीज के नाम से प्रसिद्ध है । इस अवसर पर कजली के दंगल हुआ करते हैं । गवैये दो पार्टियों में विभक्त होकर रात-रात भर कजली गाते हैं । सम्भवत: काले बादलों के बीच गाये जाने के कारण इसका नाम कजली पड़ा होगा:- कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी ।
भविष्य पुराण, जयद्रथतन्त्र, मार्कण्डेय पुराण और आल्ह खण्ड में कजरी का उल्लेख मिलता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कजरी गीत का सम्बंध कन्तित (मिर्जापुर) के परोपकारी राजा दादूराय की मृत्यु से जोड़ा है । जॉर्ज ग्रियर्सन ने भी इस मत का समर्थन किया है । भारतेन्दु के मतानुसार वहां की स्त्रियों ने दादूराय की मृत्यु से उत्पन्न दुख को प्रकट करने के लिए कजरी नामक नए तर्ज का अविष्कार किया । कजरी के एक विशिष्ट धुन का लिखित प्रमाण अकबर के शासन काल में मिलता है । कजरी का एक ही गीत प्राय: तीन विभिन्न धुनों में गाया जाता है । 1-कजरी:-समूह में बैठ कर अथवा चलते हुए ग्रामीण स्त्रियां चलती लय में गाती हैं । 2-ढुनमुनियां:- कमर तक झुक कर चुटकी बजाते हुए मण्डलाकार घूम कर गायी जाती है । 3- उजली:- गौनिहारिनों अथवा नागर स्त्रियों का ढोल-मंजीरे के साज पर गाया जाने वाला गीत है ।10
होरी, बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सहगान है जिसके प्रत्येक चरण का पूर्वार्द्ध विलंबित और उत्तरार्द्ध द्रुत होता है । होरी की टेक और अन्तरा दोनों का तुक प्राय: एक ही होता है: -धनि-धनि हो सिया तोर भाग राम बर पायो । लिखि-लिखि चिठिया बिस्वामित्र भेजे, मुनियन हाथ पठाये । होरी की एक आवृत्ति युक्त लय भी है जो चौताल की अपेक्षा द्रुत किन्तु बेलवरिया से विलंबित होती है । बेलवरिया में जहां अन्तरा के अन्तिम शब्द की तीन बार आवृत्ति होती है वहीं इस वर्ग की होरी में `हाय´ अथवा `सखी री´ शब्द स्तोभ के साथ अन्तरा का चरणांश ही दुहराया जाता है । प्रश्नोत्तर शैली की लचारी की धुन से मिलती-जुलती होरी की एक द्रुत विलंबित धुन भी है :-मोरा नीको ना लागे राम नइहरवा । कवना ही मासे बनकोइलि बोले, कवना मासे बोले मोरवा । सावन मासे बनकोइली बोलै, भादो मासे बोलै मोरवा ।
फाग, फागुन मास में गाया जाने वाला गीत है । यह एक श्रृंगारिक गीत है । कबीर और जोगिड़ा के अलावा होली के सभी गीत सहगान हैं । फाग के गवैयों का दूसरा दल प्राय: आगे का चरण अथवा पहले दल के गाये हुए चरण से मिलता-जुलता कोई दूसरा टुकड़ा गाता है । चौताल बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला विलंबित लय का एक सहगान है । चार आघात और दो खाली होने के कारण इस ताल को चौताल कहा जाता है: –
देखन में छैला बाड़ा बांका, बेटा बिगड़ा है नन्द बाबा का,
मोहन मारे डाका ।
घर से निकलल दुर्लभ हो गई दईया, नई-नई नारि देखि रोके कन्हईया,
रोके गलिन के नाका ।
चोरवन में बढ़ल इनके साखा, कुछ दिन में उजरिहें इलाका,
मोहन मारे डाका ।11
चौताल और होरी के छन्द विधान में विशेष अन्तर नही है । होरी के बोल टेक से ही द्रुत होते हैं, किन्तु चौताल से विलंबित । चौताल की विलंबित लय पुनरावृत्ति में क्रमश: द्रुत होती जाती है । अन्तरा की परिसमाप्ति पर चौताल की लय फाग गीतों में सर्वाधिक द्रुत हो जाती है किन्तु दूसरी अन्तरा आरंम्भ करते ही गायक पुन: विलंबित लय पकड़ लेते हैं और क्रमश: द्रुत होते-होते सम पर चरमबिन्दु पर पहुंच जाते हैं । यही क्रम चलता रहता है ।12 यहां यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि, फागुन माह में होरी, फगुआ, चौताल, बेलवरिया, कबीर सब साथ-साथ गाए जाते हैं ।
बेलवरिया बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सर्वाधिक द्रुत लय का गीत है । बेलवरिया जैसे टेकयुक्त द्रुत गीतों में अन्य गायक केवल टेक दुहराते हैं किन्तु विलंबित लय के टेकयुक्त अथवा टेकरहित गीतों के प्रत्येक चरण की आवृत्ति होती है । जहां चौताल की लय क्रमश: द्रुत होती है वहीं बेलवरिया की लय आरम्भ से ही द्रुत होती है । गीत को रस और गति देने के कारण ही इसे `राग लहरी´ भी कहा जाता है :-
सेजिया सईंया मोर, सेजिया सईंया मोर,
आवत में डर लागे ।
घनन-घनन करे घुघुर,
पायल करे शोर, पायल करे शोर,
एक त रात अजोरिया, चितवे चहुं ओर, चितवे चहुं ओर,
आवत के डर लागे ।
सासू हमारे दारुन, ननदी बिरही बोल, ननदी बिरही बोल,
गोतिन और पड़ोसिन, रोज-रोज करे खोज, रोज-रोज करे खोज,
आवत के डर लागे ।
सासू जे सुते ओसरवा, ननदो दहलीज, ननदो दहलीज,
सैंया सुते सेज ऊपर, जहां कानों ना कीच, जहां कानों ना कीच,
सासू के आवे अतरिया, ननदो के बुखार, ननदो के बुखार,
सईंया के होला रतौंनी, दिन सूझे ना रात, दिन सूझे ना रात,
आवत के डर लागे ।13 ( मेरे गांव वाले इस गीत को `चहका´ कहते हैं ।)

बेलवरिया पूर्णत: लय आधारित अतुकान्त गीत है किन्त कुछ मामलों में चरणान्त में तुकों का प्रयोग मिलता है ।
कबीर, फागुन में गाया जाने वाला अश्लील एकल लघु मुक्तक गीत है । इसी प्रकार जोगिड़ा होली के अवसर पर गाया जाने वाला एकल गीत है जिसमें `जोगीजी´ संबोधन कर शास्त्रार्थ शैली में गाया जाता है ।
चइता चैत के महीने में गाया जाने वाला श्रृंगार-प्रधान विलंबित लय का लघु एकल गीत है । चइता की लय इतनी विलंबित होती है कि आकार-प्रकार में छोटा होते हुए भी चरणांत तक जाते-जाते सांस टूटकर करुण रस में बदल जाती है:- धावत राम बकईंयां हो रामा, धूरी भरे तन ।
चइता मूलत: मुक्तक लोकगीत है किन्तु कुछ चइते ऐसे भी मिलते हैं जिनकी अन्तराओं में स्थायी भावों का विस्तार कर बड़ा बना लिया गया है:-
एही ठैंयां मोतिया हेरानी हो रामा । ये ही ठैंयां ….
कोठवा में ढूंढूं, अटरिया में ढूंढूं
देवरा से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैयां ….
सेजा में ढूंढूं, सुपेतिया में ढूंढूं
सईयां से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैंयां ….
बारहमासा विरहणी के अन्तर्मन की अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है । साल के बारह महीनों में विरह का अलग-अलग वर्णन यहां मिल जाता है । प्रारम्भ जून या आषाढ़ की पहली वर्षा से होता है और अन्त जेठ या वैशाख की तपती गर्मी से । बारहमासे का लघु रूप चौमासा भी उपलब्ध है । चौमासा में आषाढ़ से कुवार अथवा सावन से कार्तिक तक, प्रकृति का विरहणी के मन पर पड़ने वाले प्रभाव का चित्रण किया जाता है:-
क्या है तकदीर हमारी तजौ बनवारी । जेठ मास तन तपौ, अंग भावे नहीं सारी । बाढ़ै विरह असाढ, बून्द अदरा झकझारी । सावन सेज भयावन लागत , प्रियतम बिनु बून्द कटारी ।
तजौ बनवारी – – भादो गगन गम्भीर पीर अति हृदय मझारी कियो करार कुआर, सवति संग बसै मुरारी । कातिक रास रचै मनमोहन, कुबजा संग आप सिधारी । तजौ बनवारी – – अगहन अमित अनेक बिकल वृषभान दुलारी । पूष लगै तन आड़ देत कुबजा को गारी । माघ बसन्त हमें नहिं भावत, झूमर, चौताल, धमारी ।
तजौ बनवारी – – फागुन उड़त अबीर, अरगजा, कूक मझारी चैत फूलै बन टेस होत मुद मंगलकारी । द्विज छोटकुन वैशाख मनावत अरे पूजि गइले बारहमास तजौ बनवारी – – 14
श्रम परिहार के गीतों में जन्तसर, धनकुट्टी, बिनावन, निरवाही, रोपनी, सोहनी, घाट, चरवाही के गीत, श्रम की प्रकृति में होने वाले बदलाव के कारण समाप्त होते जा रहे हैं ।
आटा पीसने का काम जब तक घर के जान्त पर होता था तब तक जन्तसर, भोर में घर-घर से सुनाई पड़ता था। जन्तसर दरअसल समाज और घर से उपेक्षित, प्रताड़ित नारी की पीड़ा व्यक्त करने के माध्यम थे । `रे ना, हे ना, हे राम, हुरे जी,´ ये आदि स्तोभ जन्तसर के अंग थे । चरणान्त के इन स्तोभों पर आकर दम फूल जाता था । इन्हीं स्तोभों पर स्त्रियां सांस भरती और जान्त में झींक डालतीं । जन्तसर लय प्रधान गीत है । यह छोटे आख्यानों के लंबे विवरणों का लोकगीत है:-15
सेर भर गेंहुआ रे बांसे के चंगेरिया
अरे पीसई चलेलीं जन्तसरिया हो राम ।
जान्त ना चलै रामा किलवा ना डोले
अरे जुअवा पकड़ि सखि रोवेली हो राम ।

धनकुट्टी और बिनावन के गीत प्राय: अनियन्त्रित लचारी शैली के होते हैं । बिनावन गीतों की लय, धनकुट्टी गीतों से कुछ विलंबित होती है । जन्तसर, निरवाही और किसी-किसी सोहर में यत्र-तत्र तुकों का प्रयोग हुआ है किन्तु कहरवा विशुद्ध अतुकान्त है । यद्यपि अन्त में पहले चरण के उत्तरार्ध की पुनरावृत्ति इस बात का भान नहीं होने देती ।
कहरवा की विषय वस्तु मुक्तप्रेम पर आधारित है । अपवाद स्वरूप कुछ नीतिपरक कहरवे भी देखने को मिलते हैं । कहरवा की लय द्रुत होती है । सम्भव है यह सोहर से भी पुराना हो परन्तु इसके कालखंड के बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता । यह भी सम्भव है कि बिरहों के उद्भव के बाद किन्ही दो शब्दों के मेल से यह ढाई चरण का स्वतन्त्र मुक्तक अंकुरित हुआ हो । बड़ा कहरवा निश्चित रूप से छिटका कहरवा के बाद जन्मा है ।16
मात्र लय पर आधारित लचीले विधान वाला अतुकान्त भावप्रधान गीत-सोहर सम्भवत: सबसे पुराना लोकगीत है । सोहर की सरलतम गायन-पद्धति, गायन में मात्र ताल-वाद्यों का प्रयोग, स्वल्प आरोह-अवरोह युक्त विलंबित लय इसकी पुरातनता के प्रमाण हैं । अनुमानत: जंगम जातियों के अर्ध निरर्थक गीतों के बाद ही सोहर का प्रादुर्भाव हुआ होगा। गीत में प्रयुक्त शब्दावली संस्कृत, प्राकृत, पाली और अपभ्रंश का ही विकसित रूप है । सोहर अपनी पहली अवस्था में मात्र लय आधारित अतुकान्त गीत था । दूसरी अवस्था में पद-स्तोभों का प्रयोग हुआ । तीसरी अवस्था में अनियन्त्रित तुकों का प्रयोग हुआ । तुलसी युग में इसी अवस्था का प्रभाव है ।17 पुत्र प्राप्ति पर खुशी, बंध्या स्त्री की पीड़ा, समाज के ताने, सभी कुछ सोहर में मिलते हैं । सोहर में देशकाल का अतिक्रमण करते हुए तमाम विषय वस्तुओं को समेटा गया है । जीरे के व्यापार और पुराने नगरों का भी सोहर में उल्लेख मिलता है । वैसे तो कहा जाता है कि लोकगीत कालसापेक्ष, जिजीविषा के तमाम संघर्षों, समाज की आन्तरिक और बाह्य, दैहिक और पारलौकिक संस्कृतियों को समेटते चलते हैं और ज्यादातर समाज के उपेक्षित तबकों यथा श्रमिक महिलाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम होते हैं तथापि इन्हीं संघर्षों, अभिव्यक्तियों के साथ समयसापेक्ष या देशकाल के अतिक्रमण की पृष्ठभूमि भी तैयार होती है । जैसे तमाम अभावों, विपन्नताओं और रूग्णताओं से गुजरता श्रमशील मनुष्य यदि अपने जीवन में सुख नहीं प्राप्त करता तो भी उसके सामने स्वर्ग की परिकल्पना तो होती ही है । इसी स्वर्ग की परिकल्पना के कारण वह कभी काशी तो कभी मथुरा का चक्कर लगाता रहता है । स्वर्ग को हमने नहीं देखा है र्षोर्षो फिर भी तमाम काल्पनिक गल्पों में बता दिया जाता है कि वहां क्या-क्या है या नरक में किस तरह किसको सजा दी जाती है । एक सुख या भय का वातावरण, कल्पना में ही सही, तैयार कर दिया गया है । ठीक इसी प्रकार भोजपुरी सोहर लोकगीतों में ऐसे तमाम प्रसंग आए हैं जिनसे समयसापेक्ष से बाहर जाकर परिकल्पना की गई है । मसलन की लौंग के पेड़ की बात करें । हम जानते हैं कि पूरे भोजपुरी क्षेत्र में नारियल, लौंग, केसर, गुअवा(कसैली), मंजिष्ठा(एक प्रकार की पहाड़ी लता जिससे रंग तैयार होता है) या पलास के पेड़ नहीं उगते । तथापि तमाम भोजपुरी गीतों में इन पेड़-पौधों का जिक्र हुआ है, इनके होने की परिकल्पना की गई है । ये पौधों या वनस्पतियां धार्मिक महत्व के हैं या रूप, सौन्दर्य, पवित्रता, मोहकता के पर्याय हैं, इसलिए इनसे स्वयं को जोड़कर सुख, सौन्दर्य और मोहकता की परिकल्पना की गई है :-
1- कवना बने चुए नरियलवा, कवना बनवा केवल हो । ललना, कवना बनवा चुएला गुलाब, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 3)
2-कवना बने फूले गुअवा नरियर, कवना बने फूल फुले हो, ए ललना कवना बने फूलेला मजीठिया, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 4)
3-मोर पिछुअरिया लवंगिया, त हहर झहर करे ए, जड़ से कटाइब लवंगिया पलंगा बिनाइब ए । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 10)
4-मोर पिछवरवा लवंगिया क बगिया लवंग फुले आधी राति रे, बहि लवंग कै सीतल बयरिया महंकै बड़े भिनुसार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 33)
5-मोर पिछवारे लौंग का बिरवा लौंग चुए आधी रात, लौंग बिनि-बिनि ढेर लगावों, लादत है बनिजार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 39)
6-कवना बने फूलेला सुपरिया, त कवना बने नरियर हो, आरे कवना बने फूलेला पलसवा, लोढ़न हम जाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत,सोहर सं0 14)
7- माई हे, हमराहिं बाबा के इलायची बारी, डाढ़े पाते सोहरि गइले हे । (भोजपुरी संस्कार गीत, विवाह गीत सं0 284)
लगता है ऐसी दुर्लभ, बहुमूल्य वस्तुएं जो जनसुलभ नहीं थीं, उनका लोकगीतों में सुनी-सुनाई बातों के रूप में वर्णन हुआ है । इसलिए कहीं-कहीं मिथ्या बातों का भी उल्लेख है:-ओहि रे अजोधिया एक पीपर, मोतियन फरल हो । या बलुवर खेत जोतइतुं, धन मोतिया बोअइतुं हो ।
संस्कार गीतों में सोहर के अलावा अन्नप्राशन, मुण्डन, जनेऊ के गीत भी गाये जाते रहे हैं । विवाह के गीत तो आज भी प्रचलित हैं ही । भोजपुरी समाज में हिन्दू और मुस्लिम समाज में लगभग समान शैली में विवाह/संस्कार गीतों का प्रचलन है:-
सुन्नत गीत
चांद हो तू त पश्चिमें उगिह ओखली पर उगिह, छूरा पर उगिह उगिह दुलहवा के ऊपर, चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
लोकगीतों में जातिगत विभाजन के बावजूद सांप्रदायिक विभाजन ढ़ूंढ़ना मुश्किल है । पंवरिया गायक मुस्लिम होते हुए भी सोहर और पंवारे गाते हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुतियां होती हैं । `लोकरंग-1´ पुस्तक में ऐसे कुछ गीतों को प्रकाशित किया गया है । लोकरंग संस्कृतिक समिति मुस्लिम लोकगीतों पर काम कर रही है और हम शीघ्र ऐसी स्थिति में होंगे कि उन गीतों को प्रकाशन कर सकें ।
लचारी मूलत: अभिजात वर्ग की स्त्रियों का गीत है जो वेश्याओं के कोठे और उस्तादों के सरगम की पतली गली पार कर अभिजात वर्ग की स्त्रियों तक पहुंचा है । लचारी गीतों में विवशता के भाव मिलते हैं । यह गीत दो सदी से ज्यादा पुराना नहीं है । नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में लचारी से ही ठुमरी और दादरा का जन्म हुआ है ।18 जातियों पर आधारित भेदभाव वाले भारतीय समाज में कुछ निम्नजातियों के अपने गीत थे । जैसे धोबी, तेली, दलित, नाई, गड़ेरिया कुम्हार, मल्लाह आदि के गीत । जोगी, कोल, सियरमरवा, वेश्या, हिजड़ों अदि के भी अपने गीत थे ।
समाज के विकास के साथ इन तमाम गंवई काम-धंधों में बदलाव आया । जीवनयापन की शैली बदली । लिहाजा इन गीतों को बदलना या लुप्त होना ही था । इन के बावजूद आज भी गांव , श्रम पर आधारित समाज है । वहां सिर्फ सामाजिकता और संवेदना का क्षरण हुआ है । गंवई जीवन में जो झूठ, लूट और फूट प्रवेश कर गई है उसे नियन्त्रित करने के लिए समरसता के विकास की जरूरत है । लोक जीवन में, लोकगीतों के बिना समरसता बनाए रखना सम्भव नही है । गंवई जीवन की समरसता बनाए रखने के लिए ही लोकगीतों का जन्म हुआ था। संवेदना को बचाए रखने में भी लोकगीतों का बहुत बड़ा योगदान था । अन्याय पर आधारित व्यवस्था को लोक की समरसता स्वीकार्य नहीं होती । व्यवस्था और सामन्ती संस्कृति सदा से लोेक संस्कृति के विरूद्ध रही है । लोक संस्कृति आम जनता को जोड़ती है जबकि गैर बराबरी की व्यवस्था समाज को तोड़ती है । लोकगीतों के काट के लिए अभिजात्य वर्ग ने शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाया । उसकी सामूहिकता तोड़ी, उसकी सहजता तोड़ी । उसकी बन्दिश पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए ।
आज लोकगीतों के महत्व को हल्का करने के लिए फूहड़पन का पर्याय बनाया जा रहा है । सुविधाभोगी समाज के पास लोकगीतों जैसी संपदा नही होती । श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते हैं । आज लोकगीतों की प्रगतिशील चेतना को पीछे ढकेलते हुए, उन पर गंवारूपन का मुलम्मा चढ़ाकर, स्त्रीविरोधी और अश्लीलता का पर्याय बना रहा है । अश्लीलता लोकगीतों का मूल चरित्र नहीं है । यह लोकगीतों का बाजारीकरण है । इन्हें बिकाऊ बनाने के लिए अश्लील बनाया जा रहा है । इनकी जनपक्षधरता तोड़ी जा रही है । मीडिया के दूसरे माध्यमों से हमले तेज करा कर लोकगीतों को मात्र संग्रहालयों में रखने योग्य बना दिया गया है । इन सब के बावजूद लोकगीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ है । हां उनकी धार कुन्द जरूर हुई है और ग्रामीण संस्कृति विकृत हुई है । लेकिन यह भी सच है कि जनता सदा अपनी संस्कृति की हिफाजत के लिए संघर्ष करती है । वह थोपी संस्कृति को सहजता से स्वीकार नहीं करती । यही कारण है कि आज भी शास्त्रीय संगीत जनमानस तक पहुंच नहीं पाया है जबकि तमाम कोशिशों के बावजूद लोकगीत अभी जिन्दा हैं ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

सन्दर्भ
1-लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
2-गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
3- भोजपुरी संस्कारगीत (12) ।
4- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
5-भोजपुरी संस्कारगीत (15) ।
6-गंगा घाटी के गीत- पृष्ठ 337 ।
7 -धीरे बहो गंगा-देवेन्द्र सत्यार्थी ।
8- भोजपुरी संस्कारगीत (29) ।
9,10 – गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
11 – लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढूंढ़े गए गीत ।
12- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
13, 14- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
15, 16, 17, 18- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।

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