आगामी कार्यक्रम

लोकरंग 2018,   अप्रैल/मई   2018

ग्यारहवां  वर्ष :

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लोकरंग 2017  जो सम्पन्न हुआ

महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन और दलित चेतना के कवि हीरा डोम को समर्पित रहा

(सांस्कृतिक भड़ैंती, फूहड़पन के विरुद्ध, जनसंस्कृति के संवर्द्धन के लिए)

11-12 अप्रैल 2017

मुख्य आकर्षण

बिरजिया (आदिम) आदिवासी समुदाय, लातेहार, झारखंड का बिरजिया, करम, सरगुल और महादेव नृत्य
चंदनलाल कालबेलिया लोकनृत्य समूह, जयपुर द्वारा राजस्थानी लोकगीत, घूमर, भवाई, अग्नि, कालबेलिया और चारी नृत्य
दीपांकर दास बाउल, चूचड़ा, पश्चिमी बंगाल का बाउल गान
राज मोहन म्यूजिकल ग्रुप, नीदरलैंड द्वारा प्रवासी भोजपुरी लोकगीत
चंदन तिवारी, आरा और साथियों का पुरबिया तान।
फैजाबाद अवधी लोक समूह का फरुवाही
गाजीपुर का पारंपरिक, भोजपुरी धोबिया लोक नृत्य
हिरावल, पटना का गायन
स्थानीय टीमों द्वारा-सोहर, जारी और उलटबांसियां
परिवर्तन समूह, ग्वालियर और रंगनायक द लेफ्ट थिएटर, बेगूसराय की नाट्य प्रस्तुतियां
संभावना कला मंच, गाजीपुर द्वारा भित्ति चित्र और कविता पोस्टर

महान साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893 से 1963)- हिन्दी यात्रा साहित्य के जनक, राहुल सांकृत्यायन जैसा विद्वान, घुमक्कड़ व ‘महापंडित’ की उपाधि से स्मरण किया जाने वाला कोई अन्य साहित्यकार नहीं है। आजमगढ़, कनैला के निवासी राहुल सांकृत्यायन का वास्तविक नाम केदारनाथ पाण्डेय था। कुछ वर्षों तक वह रामोदर स्वामी के नाम से भी जाने जाते रहे । उनका ननिहाल में जन्म हुआ और बचपन वहीं बीता। पंदहा से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर, रानी की सराय, मदरसे में शिक्षा शुरू हुई। नाना फौज में कर्नल के अर्दली थे । इसलिए शिकार के अलावा तमाम शहरों की यात्राओं की कहानियां, नाना सेे सुन, किशोर मन में दुनिया देखने की लालसा अंकुरित हुई। वह स्वदेश ही नही, विदेशों में जैसे नेपाल, तिब्बत, लंका, रूस, इंग्लंैड, यूरोप, जापान, कोरिया, मंचूरिया, ईरान और चीन में कितना घूमे, इसका पूर्ण उल्लेख नहीं मिलता।

हीरा डोम के बारे में हमें बहुत कम जानकारी प्राप्त है। वह बिहार के रहने वाले थे और उनकी एक मात्र कविता सरस्वती, सितम्बर, 2014 में छपी थी। कविता इतनी मार्मिक थी कि हीरा डोम को भुला पाना असंभव हो गया। पूरी कविता ‘लोकरंग-2’ में प्रकाशित की गई थी। कविता की कुछ पंक्तियां हैं-‘हमनी के रात दिन दुखवा भोगत बानी/हमनी के सहेबे से मिनती कराइबी/हमनी के दुख भगवनवो न देखत जे/हमनी के कबले कलेसवा उठाइबी’।

आमंत्रित संस्थाएं/लोक कलाकार-
परिवर्तन समूह, ग्वालियर
सामाजिक जागरुकता को अपना ध्येय बनाने वाली इस नाट्य संस्था का जन्म 2003 में अध्यक्ष, डा. आलोक शर्मा और सचिव, एयाज खान के नेतृत्व में हुआ था। संस्था ने अब तक अनेक नाटकों का मंचन किया है जिनमें आसाढ़ का एक दिन, जाग उठा है रायगढ़, दिल्ली की दीवार, कंजूस, महानिर्वाण, आदि प्रमुख हैं। विगत छः वर्षांें से ज़फर संजरी के जुड़ने के बाद इस संस्था ने नौटंकी शैली के कई नाटकों का सफल मंचन किया है जिनमें से मिथिलेश्वर की कहानी ‘बाबूजी’ पर आधारित नाटक ‘बाबूजी’ एक है।
नौटंकी- बाबूजी
नौटंकी शैली का नाटक बाबूजी मिथिलेश्वर की कहानी पर आधारित है । इस कहानी को नौटंकी शैली में रूपांतरण एवं निर्देशन, जाने-माने रंगकर्मी, फिल्म एवं संगीत निर्देशक, ज़फर संजरी ने किया है। इस नौटंकी में एक कलाकार की इच्छा और उसकी सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और भावनात्मक आवश्यकताओं के बीच का संघर्ष है।
अवधि-110 मिनट।
नाटक के केंद्रीय पात्र बाबूजी, मवेशियों का धंधा करता है मगर मन से एक कलाकार है। वह गांव का सम्मानित पंच है। वह पंचायत के विरोध के बावजूद विवादों को सुलझाने में इंसानियत के पक्ष में खड़ा होता है। वह एक ऐसी लड़की से शादी का फैसला करता है, जिससे गांव के लंपट, ज़्ाबरदस्ती छेड़खानी किए होते हैं। बाद में जब बाबूजी नौटंकी विधा की ओर आकर्षित होते हैं तो परिवार विरोध करता है मगर उनका छोटा बेटा छुटकउ साथ देता है। नाटक में बाबूजी का एक कलाकार के रूप में संघर्ष आरम्भ होता है और उसी में अंत भी ।
निर्देशक के बारे में- ज़फर संजरी, वर्तमान में ‘संजरी थियेटर ग्रुप’ मुम्बई में सक्रिय रहते हुए सीरियल तथा फिल्म संगीत निर्देशन क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। आप पारसी थियेटर कंपनी एवं पारसी थियेटर परिवार में जन्मे । साहित्य लेखन एवं नाट्य रूपांतरण के क्षेत्र में कार्य किया। स्व. हबीब तनवीर के नया थियेटर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल, श्रीराम सेंटर की थियेटर रैपेट्री, लिटिल थियेटर ग्रुप, दिल्ली आर्ट थियेटर, दूरदर्शन आदि में कार्य । कुछ फिल्मों में किरदार ।
पात्र परिचयः बाबूजी-अयाज़ खान/तारा-सीमा सोनी/छोटकउ-मनीष दूबे/बड़कउ-जितांक गुर्जर/वासंती-खुशबु सोनी/सिंदूरी-सरिता सोनी/मास्टर मनसुख-लासिम अहमद/रम्पत-अज़्ाहर खान/चम्पत-मयंक भार्गव/काका (तारा का पिता)-राहुल शाक्य/तारा की माँ-सीमा शर्मा/ठाकुर रामभजन सिंह-डॉ. आलोक शर्मा/महिला-सीमा शर्मा/पंच 1-अज़हर खान/पंच 2-गुलशन गोरकर/पंच 3-ऋषभ राजपूत/पंच 4 और डकैत-उत्कर्ष गुप्ता/पंच 5 और डकैत का साथी-अरविन्द मोहन गुप्ता/व्यक्ति 1-लक्ष्य शर्मा।
नेपथ्यः-वस्त्र विन्यास-लासिम अहमद, जितांक गुर्जर/वास्तु विन्यास-राहुल, केतन/मंच प्रबंधन-सरिता सोनी/पूर्वाभ्यास प्रबंधन-सीमा शर्मा/रूपसज्जा-अयाज़ खान, मनीष दूबे/प्रकाश संचालन-विवेक नामदेव/मंच निर्माण-मनीष दूबे/नक्कारा वादन-जमील खान/ढोलक वादन-मुंशी खान/हारमोनियम वादन-मनीष कुमार/रचनात्मक सहयोग-डॉ. आलोक शर्मा/सहनिर्देशन-अयाज़ खान
रंगनायक द लेफ्ट थिएटर, बेगूसरायः लोक नाट्य-बहुरा गोड़न
दीपक सिन्हा के निर्देशन में यह थिएटर ग्रुप मिथिला की लोक नाट्य शैली में ‘बहुरा गोड़न’ प्रस्तुत करेगा । इस नाटक को प्रस्तुत करने का मकसद भारत की लोक शैली और लोक परंपरा का मंच पर प्रस्तुतीकरण है। बहुरा गोड़न, मल्लाह जाति की एक साहसी महिला थी जो बेगूसराय जनपद के बखड़ी सलौना गांव की रहने वाली थी । यह गांव कमला और बलान नदी के तट पर स्थित है। बहुरा, तंत्र विद्या में निपुण थी। उसकी खूबसूरत पुत्री अमरौती, नृत्य विद्या में पारंगत थी। उधर दरभंगा के भरौड़ का राजा दयाल सिंह, संगीत एवं नृत्य के अलावा तंत्र विद्या में निपुण था। उसका अमरौती से प्यार हो जाता है। बहुरा इसे पसंद नहीं करती। इसलिए बहुरा और दयाल में तंत्र युद्ध होता है। बाद में बहुरा, प्रेम के आगे हार मानते हुए अपनी बेटी का ब्याह, दयाल सिंह से कर देती है। यह प्रस्तुति लोक परंपरा के साथ पितृ सत्ता के खिलाफ स्त्रियों के संघर्ष की गाथा है, साथ ही मिथिलांचल के व्यापारिक उद्भव और विकसित समाज से दर्शन कराता है।
अवधि-95 मिनट ।
पात्र परिचयः बहुरा गोड़न-आलोक रंजन/अमरौती-वर्षा रानी छवि/नटुआ दयाल सिंह-सचिन कुमार/माया-मोति मोहन/पोपली काकी-गौरव कुमार/राजा विश्वम्भर मल-विजय कुमार सिन्हा/घुटरा मल-अवनीश/सेनापति भीम मल्ल-पंकज कुमार पंकज/कामा योगिनी-वर्षा रानी छवि/हरिहर-लालजी/उग्रचंडा-मनीष कुमार/कापालिक टंका-राजू रंजन/ भुवन मोहिनी-रत्नांक प्रद्योत/वृद्ध कापालिक-दीपक सिन्हा/बाल नटुआ दयाल-यथार्थ सिन्हा व कोरस
नेपथ्यः रूप सज्जा-मदन द्रोण, पंकज कुमार/मंच सज्जा-सचिन कुमार/वस्त्र विन्यास-मोहित मोहन, आलोक रंजन/संगीत-राजू रंजन, अवधेश पासवान, विजय कुमार सिन्हा, ननकू पासवान, लालजी ।
कथा नाट्य रूपांतरण, निर्देशन व परिकल्पना-दीपक सिन्हा।
राज मोहन म्यूजिकल ग्रुप, नीदरलैंड
प्रख्यात सरनामी (हिन्दुस्तानी मूल) भोजपुरी गायक राज मोहन अपने साथी सोरद्ज (सूरज) सेवलाल और पवन माहरे के साथ, अपने व्यय पर पधार रहे हैं। राज मोहन नीदरलैंड और सूरीनाम के जाने-पहचाने सरनामी भोजपुरी और पाॅप गायक हैं। इनके कई एलबम आ चुके हैं। इन्होंने फ्रांस, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, माॅरीशस, भारत सहित कई यूरोपीय देशों में अपनी-‘बैठकगाना’ से प्रभावित किया है। राज मोहन भारतीय मूल के हैं और इनके दादा, गांव-सरनागी, तहसील हर्रैया, जिला-बस्ती, उ.प्र. के रहने वाले थे और 11-01-1908 को सूरीनाम विस्थापित हुए । इनके परनाना गांव-मंगलपुर, ब्लाक-बैकुंठपुर, जिला-गोपालगंज (तत्कालीन जिला-सारण) के रहने वाले थे और 25-01-1894 को सूरीनाम विस्थापित हुए थे। विदित हो कि 1873 से 1916 के मध्य ब्रिटिश सरकार द्वारा, अपने उपनिवेशों में गन्ने, कहवा और कपास की खेती के लिए पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 35,000 के लगभग युवा मजदूरों को कलकत्ता से पानी के 64 जहाजों पर लादकर पांच साल के अनुबंध पर डच उपनिवेश, सूरीनाम ले जाया गया था। तब सूरीनाम, नीदरलैंड के अधीन था। सूरीनाम गये मजदूरों में से केवल तिहाई मजदूर ही अनुबंध खत्म होने के बाद देश लौट पाये। शेष वहीं बस गये।
बिरजिया (आदिम) आदिवासी समुदाय, लातेहार, झारखंड-मात्र 6,000 से 7,000 की आबादी वाला बिरजिया समुदाय, आदिम आदिवासी समूहों में से एक है और हमारी जनविरोधी नीतियों के कारण अपनी संस्कृति और स्मिता की हिफाजत में संघर्षरत है। ए.के. पंकज के नेतृत्व में यह समुदाय बिरजिया, करम, सरगुल और महादेव नृत्य प्रस्तुत करेगा।

गाजीपुर का पारंपरिक भोजपुरी धोबिया नृत्य-यह टीम जीवनलाल चैधरी के नेतृत्व में दूसरी बार लोकरंग में पधार रही है। इसने देश और विदेशों में अनेक प्रस्तुतियां दी हैं और जल्द माॅरीशस तथा अमेरिका में अपनी प्रस्तुति देने वाले हैं।
अवधी लोक समूह, फैजाबाद-अवधी फरुवाही विधा में काम करने वाली यह टीम तीसरी बार लोकरंग में पधार रही है। इसने राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं।
चंदनलाल कालबेलिया लोकनृत्य समूह, जयपुर, राजस्थान-राजस्थान की इस मशहूर टीम ने देश के अलावा दक्षिण अफ्रीका, कोरिया, मलेशिया सहित लगभग तीन दर्जन से अधिक, देशों में कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं।

हिरावल, पटना-लोकरंग में क्रांतिकारी जनगीतों के माध्यम से हिरावल की उपस्थिति का हमने सदा स्वागत किया है। संतोष झा के नेतृत्व में हिरावल ने मेहनतकश जनता की अंतः चेतना को झकझोरने में जो सफलता पाई है, उसका कोई अन्य विकल्प दिखाई नहीं देता ।
चंदन तिवारी, आरा का पुरबिया तान-चंदन तिवारी ने पुरबिया लोकगीतों के संकलन का महत्वपूर्ण काम किया है। कैलिफोर्निया और मॉरीशस के लिए भोजपुरी गीतों की सीरीज तैयार की है। प्रथम झारखंड नागरिक सम्मान सहित, अनेक सम्मान प्राप्त किए हैं। महुआ टीवी के सुर संग्राम में सहभागिता सहित, अन्य टीवी चैनलों पर कार्यक्रम प्रस्तुत किये हैं। देश के सभी प्रमुख भोजपुरी महोत्सवों, अकादमियों और विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों से श्रोताओं को प्रभावित किया है।
दीपांकर दास बाउल-लल्लन फकीर के नक्शे कदम पर चलने वाले, नवद्वीप नीमतला, दक्षिण बाड़ा, चुचड़ा, पश्चिम बंगाल के चर्चित बाउल गायक दीपांकर दास बाउल, अपने दिवंगत पिता दिलीप दास बाउल के पद चिह्नों पर चल रहे हैं । इन्हें ‘ग्राम बांग्ला जातीय पुरस्कार’ प्राप्त हुआ है।

मंगलवार: 11 अप्रैल रात्रि: 8.30 बजे से

रात्रि 8.30 बजे ‘लोकरंग-3’ पुस्तक का लोकार्पण /कार्यक्रम का अनौपचारिक उद्घाटन ।
रात्रि 9.00 (10 मिनट)    जोगिया गांव की महिलाओं द्वारा कजरी गीत । गायिका-हीरमती, फूलमती, सीरमती, शांति,
गुजरी, उमरावती, आदि ।
रात्रि 9.10 (30 मिनट)     हिरावल, पटना का गायन । निर्देशन-संतोष झा ।
रात्रि 9.40 (20 मिनट)     केसरिया बालम पधारो म्हारो देश/म्हारो बादिलो चितारे बेरण आवेे हिचकी।
/नींबूड़ा नींबूड़ा गीत और चारी तथा घूमर लोकनृत्य की प्रस्तुतिः चंदनलाल कालबेलिया
लोकनृत्य समूह, जयपुर, राजस्थान की प्रस्तुति।
रात्रि 10.00 (30 मिनट)  राज मोहन म्युजिकल ग्रुप, नीदरलैंड द्वारा प्रवासी भोजपुरी ‘बैठकगाना’ की प्रस्तुतियां। संगत-
सोरद्ज (सूरज) सेवलाल (ढोलक) और पवन माहरे (धनताल)।
रात्रि 10.30 (15 मिनट)  दमादम मस्त कलंदर लोक गीत और भवाई नृत्य । प्रस्तुतिः चंदनलाल कालबेलिया
लोकनृत्य समूह, जयपुर, राजस्थान ।
रात्रि 10.45 (110 मिनट) नाटक-‘बाबूजी, परिवर्तन समूह, ग्वालियर की प्रस्तुति ।
रात्रि 12.35 (30 मिनट)   झारखंड का बिरजिया, करम, सरगुल और महादेव नृत्य।
रात्रि 1.05 (20 मिनट)     राजस्थानी अग्नि और कालबेलिया नृत्य, गोबरबंद लोकगीत ।
रात्रि 1.25 (15 मिनट)      निर्गुण गायकी की उलटबांसियां । रामजी सिंह एवं अन्य, ग्रा. सोहंग, कुशीनगर।

बुधवार: 12 अप्रैल, पूर्वाह्न 11 से अपराह्न 2 बजे तक विचार गोष्ठी

विषय-हाशिए का समाज और लोक संस्कृति ।

सहभागिता-प्रो. चैथी राम यादव (वरिष्ठ साहित्यकार), उर्मिलेश (वरिष्ठ मीडिया कर्मी), प्रो. दिनेश कुशवाह (वरिष्ठ कवि, रीवा), तैयब हुसैन (लोकसंस्कृति मर्मज्ञ, पटना), ए.के.पंकज (आदिवासी संस्कृति के जानकार, रांची), लक्ष्मीकांत पाण्डेय (विचारक, कानपुर), शंभु गुप्त (आलोचक, वर्धा), अनिल राय (आलोचक, गोरखपुर), डा. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा (आलोचक, रानीगंज, पं.बंगाल), मदनमोहन (वरिष्ठ कहानीकार, गोरखपुर), हरि भटनागर ( वरिष्ठ कहानीकार, भोपाल), हनीफ मदार ( साहित्यकार, मथुरा), अरविन्द कुमार सिंह (राज्य सभा टीवी), इरफान (राज्य सभा टीवी), सृंजय (कहानीकार, आसनसोल), चरण सिंह पथिक (कहानीकार, राजस्थान), योगेन्द्र चैबे (सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, ग्वालियर), रामजी यादव (कहानीकार, वाराणसी), ताहिरा हसन (सामाजिक कर्मी, लखनऊ), शाह आलम (सामाजिक कार्यकर्ता, फैजाबाद), विद्याभूषण रावत (सामाजिक कार्यकर्ता), दीपक सिन्हा (रंगकर्मी, बेगूसराय), शिवकुमार (कहानीकार, आसनसोल), करूणेश किशन (फिल्म निर्देशक, दिल्ली), संदीप मील (कहानीकार, राजस्थान), अखिलेश्वर पाण्डेय (कवि/पत्रकार, जमेशदपुर), मनोज कुमार सिंह (सामाजिक कार्यकर्ता, गोरखपुर), अभिषेक पंडित, ममता पंडित (रंगकर्मी, आजमगढ़) एवं अन्य साहित्यकार/रंगकर्मी ।

बुधवारः 12 अप्रैल : 8.30 रात्रि से

रात्रि 8.30 (30 मिनट)    हिरावल, पटना का गायन । निर्देशन-संतोष झा ।
रात्रि 9.00 (30 मिनट )  पारंपरिक भोजपुरी धोबिया नृत्य, गाजीपुर । निर्देशन-जीवनलाल ।
रात्रि 9.30 (30 मिनट)   चन्दन तिवारी का गायन ।

रात्रि 10.00 (30 मिनट)  राज मोहन म्युजिकल ग्रुप, नीदरलैंड का प्रवासी भोजपुरी ‘बैठक गान’ । संगत-
सोरद्ज (सूरज) सेवलाल (ढोलक) और पवन माहरे (धनताल)।
रात्रि 10.30 (30 मिनट)  दीपांकर दास, पश्चिमी बंगाल का बाउल गायन और नृत्य ।

रात्रि 11.00 (95 मिनट)  नाटक-‘बहुरा गोड़न’, रंगनायक द लेफ्ट थिएटर, बेगुसराय की प्रस्तुति ।

रात्रि 12.35 (30 मिनट)  अवधी लोक समूह, फैजाबाद की फरुवाही । निर्देशन-शीतला प्रसाद वर्मा।

रात्रि 1.05 (15 मिनट)    जारी गीत, लोकरंग की प्रस्तुति ।

रात्रि 1.20    समापन और धन्यवाद ज्ञापन/ग्रुप फोटोग्राफी ।

संचालक-प्रो. दिनेश कुशवाह, हिन्दी विभाग रीवा विश्वविद्यालय (म.प्र.) के विभागाध्यक्ष हैं । मूलरूप से बरहज, देवरिया के निवासी श्री कुशवाह, लोक चेतना के जाने-माने कवि हैं ।

 

संपर्कः- 9919306237/9919950835
सप्रेम आमंत्रण/प्रवेश निःशुल्क

 

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